चुनाव के प्रति मतदाताओं का वैचारिक चिंतन और आक्रोश

चुनाव के प्रति मतदाताओं का वैचारिक चिंतन और आक्रोश


                     प्रोफे. डां. तेजसिंह किराड़


              (वरिष्ठ पत्रकार व राजनीति विश्लेषक)


 मप्र में उपचुनाव और बिहार के आम चुनाव अब धीरे-धीरे राजनीति के रंग में रंगते जा रहे हैं। अपने जन प्रतिनिधियों के प्रति चुनाव क्षेत्र की जनता का घुस्सा और धैर्य अब फूट पड़ा हैं। सत्ता में बनें रहने और विपक्ष द्वारा सत्ता को छीननें की जद्दोजहद आरंभ हो चुकी हैं। क्षेत्रीय मुद्दों के मंजर नए और पुराने सभी नेताओं के लिए टिकिट की जुगाड़ में सबसे बड़े रोड़े बनकर सामने आ रहे हैं, और कोरोना हैं कि इन दोनों ही चुनावी राज्यों में नियंत्रण से बाहर नजर आ रहा हैं। अब मतदाताओं के ही भरोसे चुनाव की यह वैतरणी पार करनी हैं।


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चुनाव आयोग ने बिहार और मप्र के चुनावों को हरि झंडी दे दी हैं। कोरोना काल में वैसे भी सब काम धंधें ठप्प पड़े हुए हैं इसलिए केन्द्र सरकार ने खुले हाथों से मप्र और बिहार के लिए कई बड़ी बड़ी सौगातों की घोषणा कर दी हैं। मुम्बई के बालीवुड के हालातों को देखते हुए उप्र के मुखिया योगीजी ने एक नया बालीवुड उप्र में बनाने की नई घोषणा कर दी हैं। क्योंकि उप्र में भी चुनाव आने वाले हैं। योगीजी को पता है या नहीं मालुम नहीं मुझें कि, फिल्म निर्माण के लिए समशीतोष्ण जलवायु की जरुरत होती हैं। इसलिए मुम्बई फिल्मों के लिए प्राकृतिक और भौगोलिक दोनों ही दृष्टि से सर्वदा उपयुक्त हैं ना कि नोएडा मुम्बई बन सकता हैं । दुनिया के लगभग सभी देशों में बड़े-बड़े हालीवुड और बालीवुड पश्चिमी किनारों पर ही बनें हुए हैं। हां ! चुनाव के लिए ऐसी जलवायु की कोई जरूरत नहीं रहती हैं। देश के किसी भी राज्य के कोने से या क्षेत्र से चुनाव लड़ा जा सकता हैं। फर्क इतना ही हैं कि जीतता वही हैं जिसे जनता चाहती हैं और जनता भी उसे ही चुनती हैं जो जनता के मुद्दों को हर संभव हल करने के लिए भागीरथी सफल प्रयास करता हैं। आज देश की राजनीति में हालात तेजी से बदलते जा रहे हैं। सूत्रों कि माने तो आज राजनीति में साम,दाम,दंड और भेद से ज्यादा जनता को अपना हितैषी जनप्रतिनिधि चाहिए ना कि एक बार जीतने के बाद फिर पांच साल बाद चेहरा दिखाने वाले प्रतिनिधियों को तो अब जनता ने स्वयं ही नकार दिया हैं। खबर हैं कि बिहार में सबसे बड़ी मुसीबत ऐसे विधायको की हो रही हैं जिन्होंने जीतने के बाद कभी जनता के बीच जाना उचित नहीं समझा। हाल ही में एक टीवी चैनल पर दिखाई बिहार की ऐसी ही एक खबर ने देश के सभी मतदाताओं को झकझोर कर रख दिया हैं। हुआ यूं कि एक महोदय पांच साल बाद जनता के बीच गए जनता ने झगड़ा करके उल्टे पैर उन्हें लौटा दिया । अब यहां ना साम दाम,दंड भेद कुछ भी काम नहीं आया। भारत के लोकतंत्र में भी चुनाव की प्रणाली भी बड़ी विचित्र हैं। मैं क्या देश का कोई भी मतदाता आजतक ये नहीं समझ पाया कि आजादी के बाद से परिवारवाद, वंशवाद,रिश्तावाद भाई भतीजावाद,पहुंचवाद,रिश्वतवाद खरीदीवाद का बोलबाला राजनीतिवाद में ही क्यों हैं ? इसे लेकर हाल ही में एक बड़े नेता ने बहुत ही ठीक कहा कि चुनाव जीतने के लिए कोई ना उम्र होती हैं ना लिखाई -पढ़ाई। जीत गए तो मोटा वेतन, सुरक्षा, सम्मान,और पेंशन तो मिलती ही रहेगी। बड़ी अजीब सोच हैं इन नेताओं की। इन्हें बनाते हमसब हैं और बाद में सुख हमें गिनाते हैं। डाक्टर,इंजीनियर,पीएचडी, एमए, एमफिल आदि डिग्रीधारी जिंदगी भर रोजगार के लिए पापड़ बेलते रहते हैं और एक कम पढ़ा लिखा या नहीं पढ़ा लिखा हमारा प्रतिनिधि बनकर वो सब सुख भोग लेता हैं जिसके लिए एक पढ़ा लिखा जीवन भर तरसता रहता हैं।और संघर्ष करते हुए दम तोड़ देता हैं। कई मामलों में देश की जनता कहती हैं कि मोदीजी है तो सब संभव हैं! हमसब भी मोदीजी से यही चाहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र के चुनावी ढांचें को संशोधन करके ऐसा बना दीजिए कि चुनावी समर में, विधानसभाओं में,लोकसभा में लोकतंत्र के न्यायसंगत दर्शन हो सकें! ना परिवारवाद हो,ना अनपढ़वाद हो,ना जातिवाद हो,ना आरक्षणवाद हो,ना भाई -भतीजवाद हो और ना ही पहुंचवाद हो। जनता अपना प्रतिनिधि स्वयं तय करें कि उनका सच्चा सेवक और भागीरथ कौन सा व्यक्ति जनप्रतिनिधि बनेगा। आज पार्टियों के थोपे गए प्रत्याशियों से जनता और मतदाता सबसे ज्यादा तनावग्रस्त बनें हुए हैं। जनता का करोड़ों अरबों रूपया ऐसे ही चुनावों की भेंट चढ़ रहा हैं। दलबदल को समाज के लिए एक नासूर मानकर सबसे पहले चुनाव आयोग ने कोई ठोस कदम और नियम बनाने चाहिए। भारत बदल रहा हैं! भारत आत्मनिर्भर बन रहा हैं! भारत महाशक्ति बनेगा ! भारत दुनिया को ज्ञान देगा! भारत की शिक्षा नीति से दुनिया को लाभ होगा! चारों तरफ यहीं गूंज रहा हैं। ये सबकुछ होना चाहिए सबको मंजूर हैं परन्तु देश में पार्टीगत स्तरों पर दलबदल नहीं होना चाहिए। यह परम्परा आज बहुत ही घातक और विकास की योजनाओं का अवमूल्यन करने वाली साबित हो रही हैं। इस पर कोई नहीं बोलता और ना ही कोई लिखता हैं। लोकतंत्र में चुनाव के सिस्टम में आमूलचूल परिवर्तन की आज सबसे बड़ी जरूरत हैं। हमसब बालीवुड में ड्रग्स माफियाओं पर तो बहुत जोर जोर से गला फाड़कर चिल्लाते हैं। बड़े-बड़े आर्टिकल लिखते हैं किन्तु राजनीति में सुधार के नाम पर बोलने के लिए मुंह पर पट्टी लग जाती हैं! क्योंकि आंकड़ों के गणित में सत्ता की लालसा पक्ष और विपक्ष दोनों की एक बड़ी जरूरत बन चुकी हैं इसलिए कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका ने भी इस दिशा में जनता के चहुमुखी विकास और प्रगति हेतु कारगर कदम उठाने होगें। किन्तु हर बार ये गंभीर मुद्दा दबा दिया जाता रहा हैं। वोटिंग मशीन में बटन जरूर हैं कि इसमें से कोई नहीं! किन्तु उनका क्या! जो जीत गए और जनता से दूर हो गए ! आखिर ये कबतक ऐसा ही चलता रहेगा! आज मतदाताओं का मत अधिकार और उनकी ठेरों अपेक्षित भावनाऐं दांव पर लगी हुई हैं। जिसे जमीनी स्तर की जनता की अदालत में जगह जगह चौपालों पर ही हल की जाना चाहिए। ताकि सत्ता के नशें में जनता के सपनों को कोई तोड़ ना सके। और उनके मत के अधिकार का कोई गलत उपयोग ना कर सकें। आज चुनाव में नेताओं की भीड़ में वे लोग ज्यादा होते जो पहली बार नए मतदाता बनें हैं और जो जमीन से जुड़कर अपने क्षेत्र में विकास और परिवर्तन की चाह रखते हैं। और निर्णायक मतदाता होता हैं वह घर बैठकर ही केवल मूल्यांकन करता हैं कि प्रत्याशी का जमीनी सच क्या हैं ? और मतदाताओं का रुझान क्या हैं ? प्रत्याशी की बाड़ी लेंग्वेज और बोलबचन का प्रभाव भी मतदाताओं के सिर चढ़कर बोलने लगता हैं। वहीं मानसिक उथल पुथल में प्रत्याशी की जीत का सौभाग्य और हार का दुर्भाग्य जन्म लेता हैं। आज जीत व हार के सैकड़ों हथकंडों में अमर्यादित भाषा का प्रयोग और अर्थहीन टिप्पणियों के दोषारोपण का चलन भी तेजी से चुनावी प्रचार रणनीति का एक अंग बनता जा रहा हैं। लोकतंत्र में मतदाता एक स्वतंत्र व्यक्ति हैं ऐसे में उसके हाथों से ही जीत-हार के परिणाम सुनिश्चित होते हैं। मतदाताओं को चाहिए कि वे प्रत्याशियों की हर एक सच्चाई के सूक्ष्म मूल्यांकनकर्ता बनें ना कि किसी विचार या प्रभाव या दबाव के बहाव में मत का दुरुपयोग करें। अपने घुस्से और धैर्य को समाज,क्षेत्र,राज्य और राष्ट्र विकास के संकल्प को समर्पित करने की आज सबसे बड़ी जरूरत भी हैं।


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