क्या है हमारी जिम्मेदारी, हमने क्या खोया क्या पाया

क्या है हमारी जिम्मेदारी, हमने क्या खोया क्या पाया



             ( लेखिका निवेदिता मुकुल सक्सेना)                                               झाबुआ मध्यप्रदेश


एक गजल की कुछ पंक्तियाँ याद आयी "तुम चले जाओगे तो सोचेंगे " ये पंक्तियाँ भी आधिकमास के चलते एक भागवत मास की प्रथम दिवस पर व्यास पीठ पर विराजित परम पूज्य श्री भाई श्री द्वारा पोरबंदर स्थित सांदीपनि आश्रम से वाचन की जा रही। एक गजल ने जीवन के बाद की व्याख्या कर दी "तुमने क्या खोया क्या पाया " या कहे "हमने क्या खोया हमने क्या पाया "नाम के साथ कर्मो का तराजू बस यही तो रह गया । 


वही वर्तमान मे चाहे सोशल मीडिया हो या आस पास की खबर अनुसार कोरोना वैश्विक महामारी के चलते नित्य कोई ना कोई अप्रिय घटना देख रहे तब लगता हैं की चन्द मिनटो या सैकेण्ड मे किस तरह आत्मा की डोर शरीर से टुट जाती है अपनो से दुर कर देती ।क्या होता हैं हमारे जाने के बाद ? बहुत कमी अखरती हैं , क्या होगा हमारी पुरजोर मेहनत की कमाई का।


 ये सही है, इन्सान जन्म लेने के बाद से समझ आने तक अपनी दुनिया सवारता हैं। खुद के लिए ओर अपनो के लिए हर वो चीज जुटाता हैं जिसके कारण उनके जीवन मे व्यवधान उत्पन्न ना हो ,और ये फिक्र उसे मृत्यपर्यन्त चलती रहती हैं। पहले खुद को आत्मनिर्भर बनाना फिर बच्चो की परवरिश, उनकी शादी फिर ,उनके बच्चो की परवरिश उसमे खुद के बुढापे की फिक्र ,जो एक सामान्य से जीवन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है। ईश्वर ने भी धरती पर हमे इसी लिए भेजा हैं। "सन्त ओर गृहस्थ " की जिम्मेदारी का अन्तर स्वरुप स्पष्ट हैं। जिसमे सन्त समाज को नैतिकता व मौलिकता का पाठ वेदो पुराणों व आध्यात्म की दृष्टि से प्रसारित कर समाज मे फेली नकरात्मकता को दुर करता हैं। वही गृहस्थ संसारिक कर्मो मे लीन रहते हुये सन्तो के वचनो को अपने जीवन मे आत्मसात कर मानसिक तनाव दुर कर जीवन को सरल व सहज बनाता हैं।जिससे उच्च पारिवरिक व समाजिक दृष्टिकोण व्याप्त कर सके । 


 वर्तमान मे फिल्मी जगत हो या राजनैतिक व्यक्ति अपनी लीक से हटता नजर आ रहा हैं। जहा फिल्म या चलचित्र का वास्तविक कार्य मनोरंजन व समाजिक हित मे फिल्मो या नाटको का बनना है ,ना की समाज को दिशाहीन करना । अब अगर हम ये भी नही सोच पा रहे कि वास्तविक जीवन मे हम रिश्तो के कई किरदार निभाते है जहा हम कुछ सार्थक कार्य भी करते ओर कई कोशिशे भी। जाने अनजाने में कई षढयंत्रो को रचते है जिसमे पुरी तरह एक अपराधी की भुमिका भी निभा जाते है जिसमें खुद को जीवन मे आगे रखने के लिये बहुत से जरूरतमंदो के हिस्से को स्वहित के लिए डकार जाते है, ये भुलकर की अति का खाया कब ओर कैसे अपच का रुप ले लेगा । आखिर इन सबका अंत क्या होगा। क्या इसमें मे मेरा या मेरे परिवार का हित भी है या नही या सिर्फ ईश्वर के बनाये इस मानव शरीर का हम गलत उपयोग कर रहे ?                   ये "मन की चंचल" डोर को सम्हालना बहुत मुश्किल है क्योंकि ये बेलगाम घोढे की तरह इधर उधर दौड रहा जहा मिलना कुछ नही सिर्फ शरीर ओर मन को भटकाना । 


 


      एक कस्तूरी म्रग भी अपने अन्दर छुपी खुशबु को बाहार तलाशता रहता हैं एक भटकती आत्मा की तरह मोक्ष प्राप्ति के लिए । उसे नही पता कि बेशकीमती खुशबु उसके शरीर का ही एक हिस्सा है। जिसकी खुशबु चहु ओर फेल रही हैं ओर स्वयं को आत्ममुगध कर रही हैं। जहा दुसरे लोग ये जानतें है की खुशबु कहा से आ रही ओर उसको पाने के लिये वो उसको उसके शरीर से किसी भी कीमत पर प्राप्त कर ही लेते हैं क्युकी उसके शरीर के अंडकोष से इत्र तैयार कर व्यापार करना हैं। इत्र के लिये वह अपनी भावनाओ ओर संवेदनाओं को ध्यान भी नही देता क्योंकि वह व्यावसायिक व्यक्ति है वह सिर्फ धन तक सीमित हैं उसे नही पता की अंत मे ये खुश्बू से प्राप्त किया धन क्या अन्तिम क्षणो मे आत्मा को भी सुगंधित कर देगा या आत्मा ये सुगंध फेलाती रहेगी।


 


       बिल्कुल वेसे ही जीवन हम जी रहे जहा हम अपनो को भी दरकिनार कर देते हैं। दो भाई अलग होते हैं या भाई भाई संपत्ति के लिये लड़ते नजर आते है,जबकि पुर्व की अपेक्षा वर्तमान मे शिक्षा का स्तर बढ गया । 


 


    एक सत्य जीवन का जो मिल नही पाता लेकिन वह खिलौनो से खेलने के लिये मजबुर कर देता हैं ।जो भ्रमित मायावी जाल समान उम्मीदो ओर अपेक्षाओ से भरा रहता हैं जो एक पुरा होता तो दुसरा सपना शुरु। यही "अपेक्षाए- उपेक्षाओ" के समय वास्तविकता का एहसास कराती है। अब तक क्या कर रहे थे । वो अपना नही था ,उसमे मे कईयो के खिलोने शामिल थे ।लेकिन हमारा खिलौना नही चला उनका चल गया।


                  जब तक ये खेल खत्म होता है । व्यक्ति भ्रम मे ही जीता हैं खुद को पहचान ही नही पाता। एक अन्धकारमई दौड मे भागता रहता हैं ओर रुकता भी अन्धे कुएँ में है।


         लेकिन हा कुछ कर्म इस जीवन में पुण्यदायी फ़ल प्राप्त कराते है। जो अपने जाने के बाद भी अपने ना रहने का समय-समय पर एहसास कराते है। यही यादे कहलाती हैं। जो सत्व की पराकाष्ठा से परे होती हैं।


              सोच कर मुस्कुराहट भी आती है कि जीवन के बाद क्या खोया क्या पाया। तब जब विश्व मे कोरोना संक्रमण का हाहाकार मचा है। चलते फिरते इंसान को नही पता की अगला पल कहा ओर कैसे होगा।


 


          " जिम्मेदारी हमारी"


 


 ईश्वर ने बहुमुल्य मानव जीवन दिया है जो है उसे सहेज कर रखना जरुरी है , अपनो के लिये ओर जरूरतमंदो के लिए। स्व से निकल देखे दुनिया को ।


 


रिपोटर चंद्रकांत सी पूजारी


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