फुटपाथी जिंदगी मौत का मंजर और सरकारें मौन

 फुटपाथी जिंदगी मौत का मंजर और सरकारें मौन


                     प्रोफे. डां. तेजसिंह किराड़

              (वरिष्ठ पत्रकार व राजनीति विश्लेषक) 

ऐ ! भाई जरा देख के चलो। आगे ही नहीं पीछे भी। ऊपर ही नहीं नीचे भी। दिन में ही नहीं रात में भी। सड़क पर ही नहीं फुटपाथ पर भी। ये पंक्तियां जिंदगी और मौत के इतिहास का एक दर्दनाक दस्तावेज बन चुकी हैं। सड़कों के मकड़जाल और  पेट की खातीर दो जून की रोटी को तरसती गरीबों की जिंदगी को फुटपाथ के हादसों ने दहला दिया हैं। बेलगाम गति और नशें में धूत वाहन चालकों की मनमानी पर आखिर कब कठोर कानून बनेगा और कब फुटपाथ पर सोने वालों कि जिंदगी में स्थायी रूप से रैन बसेरों की एक नई रोशनी नसीब हो सकेगी।

किसी ने बिल्कुल ही सच कहा हैं कि गरीब की जिंदगी और अमीर की जिंदगी में हर दृष्टिकोण से फर्क देखने का चश्मा हर किसी ने पहन रखा हैं। राज्य कि सरकारें हो या केन्द्र की सरकार। दिहाड़ी मजदूरों की बदहाली और उनके फुटपाथी जीवन को लेकर आजतक कोई भी सरकारें गंभीरता से   कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं कर पा रही हैं। शहरों की बड़ी बड़ी गगनचुम्बी  अट्टालिकाऐं हो या चमचमाती फोर लैन या सिक्स लेन सड़कें। इनको बनाने वाले मजदूरों की बदहाली पर सरकारों का ना कठोर दिल पसीजता हैं और ना ही इनकी फुटपाथी मौत को लेकर राज्य सरकारों ने कोई कठोर कानून बनाएं हैं। अंधाधुंध भागते वाहनों के पहियों से कुचलकर होने वाली मौतों पर कोई राष्ट्रीय आंदोलन अमीरों ने नहीं किए और ना ही कलम के पहरेदारों ने कभी खुलकर इनके हक के लिए कभी आवाजें उठाई हो ! गरीबों की फुटपाथी जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले वाहन चालकों और उनके मालिकों  को ना तो कोई कठोर सजा मिल पाती हैं और ना ही गरीबों को उचित न्याय मिल पाता हैं। हाल ही में गुजरात के सूरत लगे कोसांबा इलाके में एक डंपर ने 20 लोगों को बुरी तरह कुचल दिया। इस हादसे में पन्द्रह लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। राजस्थान से गुजरात आएं इन मजदूरों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कोरोना काल के भीषण दौर के बाद उनकी जिंदगी को इस तरह  बेलगाम वाहन लील लेगा। कोरोना काल में मजदूरों को लेकर गृह वापसी पर जो दृश्य देश दुनिया ने देखें थे उससे हिली राज्यों की सरकारों ने मजदूरों के हितों के लिए बड़े बड़े कल्याणकारी कानून बनाने कि बड़ी बड़ी हवाई  बातें भी खुब की थी। किन्तु आज इन मजदूरों और दो मासूमों की मौत पर गुजरात सरकार और राजस्थान सरकार की पोल खुल चुकी हैं। मजदूरों के अन्तर्राज्यीय प्रवासों को लेकर एक पहचान पत्र दिए जाने और राज्य सरकारों की आपसी स्वीकृति के उपरांत ही उन्हें प्रवास की मंजूरी देने की बातें कही गई थी। यदि मजदूरों को  सरकारें मजदूरी देती हैं तो उनके स्वास्थ्य और रहने खाने की व्यवस्था भी मजदूर के मालिकों को करने के प्रावधान सुनिश्चित किए गये थे। कोसांबा के हादसे के बाद अब यह खुली बहस कि जरूरत हैं कि आखिर ऐसी दुर्घटनाओं के लिए  कौन दोषी हैं और सरकारों ने कही बातों को कितना अमल किया ? हाईकोर्ट और सुको ने भी गरीबों के न्याय के लिए सरकारों को कड़ी फटकार लगाकर जनहित में प्रकरण दर्ज कर जनता के संवैधानिक मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए उचित पहल करके लोकतंत्र में न्याय को सशक्त बनाने की कार्रवाई करना होगी। केवल राज्राय या केन्द्र सरकार के नेताओं द्वारा किसी फुटपाथी मजदूर की मौत पर दुख प्रकट करने से या मुआवजा भर देने से फाईल बंद नहीं हो जाती हैं। सड़कों पर हादसों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा हैं। रात में नशें में चला रहे भारी वाहनों की चेकिंग टोल नाकों पर ना होने से सड़कों पर आम राहगीरों और फुटपाथ पर सोने वालों की जिंदगी से सरासर मौत का खेल खेलनें वालों को उम्रकैद से कम की सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए। क्या आम लोगों और मजदूरों  की जिंदगी के कोई मायने नहीं हैं? क्या उनकी इंसानी जिंदगी इतनी सस्ती बन चुकी हैं कि ऐसी दुर्घटनाओं के बाद उन्हें जमानत देकर फिर सड़कों पर मौत का तांडव करने कै लिए खुला छोड़ दिया जायें। राज्यों और देश में हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं और फुटपाथों पर कितनों की जिंदगी लील ली जाती हैं और उनसे जुड़े कितने परिवार तबाह होकर सड़क पर आ जाते हैं यह एक गंभीर चिंतन का विषय हैं। मैं आंकड़ों की बातें  नहीं लिखूंगा। आंकड़ों पर तो  सरकारों को सोचना हैं और उन्हें ही कोई कठोर कानून भी बनाना होगें। सड़कों के किनारें सोने वाले बेसहारा मजदूरों पर आते जाते व गुजरतें क्या  यातायात पुलिस की निगाहें नहीं पड़ती हैं? थोड़ी सी पहल यदि इन बेसहारा मजदूरों के लिए पढ़े लिखें सभ्य कहलानें वाले लोग,समाज में कुकुरमुत्तें की तरह बन चुकी हजारों समाजसेवी संस्थाओं ने अपने उद्देश्यों में भी लिखा ही होगा कि गरीबों, बेसहारा और जरूरतमंदों की सेवा करने की बड़ी बातें लिखी हुई हैं तब इनका ध्यान इन फुटपाथों पर सोने वालों कि और क्यों नहीं जाता हैं ? हम सब इतने निकम्में हो चुके है कि ना तो ऐसी भयावह घटनाओं पर लेखन करते हैं और ना ही नौकरशाह होकर अपने अधिकारों का उपयोग किसी की जिंदगी को बचाने के लिए आगाह करते हैं। सरकार सोचती हैं जनता करेगी और आम नागरिक सोचता हैं कि सरकारें करेगी। कुएं या होल में गिरे किसी बच्चें या जीव को बचाने के लिए लाखों खर्च करके उसे जिंदा देखने की कोशिश करते हैं किन्तु फुटपाथों पर रहने वालों के लिए कोई मसीहा बनकर उन्हें समझानें की पहल नहीं करता हैं। यह विड़म्बना हैं हमारें सामाजिक तानेबाने की। हम ये भूल जाते हैं कि एक अंधेरी झोपड़ी में रहने वाले मजदूर के हाथों से ही हमारे बड़े बड़े भवन रोशन होते हैं वरना हमारी इतनी कुबीयत कहा हैं कि हम एक ईंट को जोड़ सकें और हमारा घर स्वयं बना सकें। न्याय का मंदिर हो या भगवान का पवित्रधाम मंदिर, नेताओं के आलीशान भवन हो या कानून बनाने वाली संसद का सदन,सड़क हो या जरूरतों को पूरा करने वाले कलकारखानें सबमें एक मजदूर की मेहनत का श्रम जुड़ा हुआ हैं। हमसब श्रम मेव जयते तो लिखते हैं और बोलते हैं किन्तु मजदूरों को दुर्घटनाओं में मरने पर कोई भी नेता दुख नहीं जताने उनके घर किसी सेना के जवान की तरह नहीं जाता हैं। कितना फर्क है कि एक कि मौत को शहीद का दर्जा मिला हुआ हैं और एक नवनिर्माण करने वाले  मजदूर की मौत  पर कोई उनके परिजनों से सहानुभूति तक जताने कोई मंत्री या होदे का आला अधिकारी तक नहीं पहुंचता हैं। हमारी वैमनस्यता की कलुषित सोचने इंसानी जिंदगी को कई तरह की परिभाषाओं में बांट देने से आज इंसान ही इंसान से दूर होता चला जा रहा हैं ऐसे में उस बेजुबान पशु की सेवा या फिक्र करने की बातें करना सरासर बेईमानी साबीत होगा। किसी पिंजरें के  तोते की तरह हमसब सदैव यहीं बोलते रहेगें कि सत्य मेव जयते और श्रम मेव जयते। चाहे इसका अर्थ हमें पता हो या ना हो।

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