अच्छाई धारण करें, बुराई त्यागें - जैन मुनि

अच्छाई धारण करें, बुराई त्यागें - जैन मुनि


भिण्ड/कोडरमा 8 सितंबर (राजकुमार अजमेरा) l परम पूज्य गणाचार्य श्री 108 विराग सागर  महाराज ने अपने प्रतिदिन के प्रवचन में कहे कि मन के संकल्प विकल्प को ज्ञान दूर करता है संकल्प अभिमान को उत्पन्न करता है दूसरे की कुछ न मानना और स्वयं को श्रेष्ठ मानना अहंकार है l ममकार यानी ये मेरे है शास्त्र स्वाध्याय से मै पना अहंकार भी साधना में विकल्प उत्पन्न करता है साथ न कुछ आया न जाएगा एक नाम मिटाकर दूसरा नाम लिखा जाता है l अतः चक्षु खोलो कौन अपना है कौन पराया है केवल मोह की माया है l राग द्वेष में आकर अपना पराया पन में फस्ता है अतः में कोई हमारा नहीं है ज्ञान उत्पन्न होते ही मोह के बंधन कमजोर पद जाते घाटा फायदा में कोई अंतर नहीं है रटी हुई विद्या आचरण में नहीं आती क्योंकि वह परायी है आत्मा में परमात्मा निवास करता है ज्ञान मानकर आत्मज्ञान करे तो शास्त्र स्वाध्याय सार्थक है। अच्छाई धारण करे बुराई त्यागे यही जिनवाणी का सार है l


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