चिंता नहीं चिंतन में जियो- आचार्य विराग सागर

चिंता नहीं चिंतन में जियो- आचार्य विराग सागर


भिण्ड-चिंता और चिंतन में अंतर है।चिंता में व्यग्रता व चिंतन में प्रसन्नता होती है आडी लकीरें तब आती है जब चिंता होती है चिंतन में खड़ी पर चिंतन में आगे निकलने पर भगवान के मस्तिक पर लकीरें ही नहीं बनती धार्मिकता के भाव टेंसन मैं नहीं आते देव,शास्त्र गुरु के चरणों में शांति व समाधान मिलता है चिंतनशील बने तो सामने वाला व्यक्ति फ्रेश हो जाता है साधु जब धरने की बात कहते हैं तो प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है आशा मंडल भी खुश करता है अहीत राग द्वेष की बात को बंद करो और सत्य पवित्र विचारों में डूबो चेहरे बिगाड़ना संसारी की टेंशन अवस्था है ब्रह्म रोग है इसे दूर करने वाली जिनवाणी है चिंता आजकल के परिवेश में मुख्य बीमारी है गुरुदेव ने कहा चिंता शुभ व अशुभ दोनों होती है साधु जन तकदीर व तदबीर दोनों बदलते हैं चिंतन कीजिए चिंतन समाधान देता है पछतावा प्रसंता दोनों एक साथ नहीं होते आंसू ख़ुशी व संताप के होते हैं सावधानी हो संक्लेश हो विवेक हीन ज्ञान हीन चिंतित होता है चिंतन से संसार छूटेगा चिंता शील को नींद चिंतन का अर्थ भावना है चिंतन संसार को क्षीण करता है चिंता छोड़ो चिंतन करो सांप के बिना मन के विचार जहर बना देते हैं गलतफहमी दरअसल उर्दू बद्री की भाषा का शब्द है जिसमें फैला व्यक्ति ना समाज हित कर सकता है ना परिवार का न स्वयं का। प्रवचन में इंजेक्शन लगाते हैं जिससे इंफेक्शन नहीं फैलता। स्वस्था मे धर्म ध्यान होता है चिन्तन परम औषधि है तीर्थंकर कभी बीमार नहीं होते मनुष्य बीमार होते हैं बैरागी तत्व चिंतक हर परिस्थिति में मुस्कुराते हैं परमात्मा के ध्यान में उतरने वाले निज स्वाध्याय को पा जाते हैं।


संकलन कर्ता-राज कुमार अजमेरा, नवीन गंगवाल-कोडरमा


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