जगतीया, श्राद्ध और संस्कार, उसमे क्या है हमारी जिम्मेदारी

जगतीया, श्राद्ध और संस्कार, उसमे क्या है हमारी जिम्मेदारी



(लेखिका निवेदिता मुकुल सक्सेना झाबुआ ) 


समाज, संस्कृति, शिक्षा और धर्म पर लेखिका के आलेख पूर्व में आप सभी पढ़ते आ रहे है। आज लेखिका समय के मान से पूर्वजों के त्योहार श्राद्ध के महत्व और उसकी वैज्ञानिकता पर अपना दर्शन बता रही है कि इस वैज्ञानिक युग में भी मृत्यु पश्चात क्रियाकर्म और श्राद्ध की आवश्यकता क्या है और इसका वैज्ञानिक महत्व क्या है?


भारत के हर त्यौहार ओर कर्मकांड अपना एक वैज्ञानिक महत्व रखते है, यह भी सत्य है जीव जन्म से मरण तक का हर सफर ईश्वर के सानिध्य में कर्म के बैलेंस पर अपनी जगह बनाता है। पूर्व समय से साधु संत अपनी सांसारिक मोहमाया को त्याग देते थे और साथ ही मरणोपरांत की क्रिया महत्वपूर्ण भाग हुआ करती थी। परन्तु जीते जी तेरहवां व श्राद्ध स्वयं कर देते जिसे ''जगतियाÓÓ कहते है। कारण है अपेक्षा ओर उपेक्षा से दूर स्वयं की मोक्ष प्राप्ति।


फिर मध्य काल में सभी अपने पितरो की मोक्ष के लिए समय-समय पर सभी धर्मो में पूर्वजों को याद किया जाता रहा है, परंतु वर्तमान में मनुष्य जीते जी ही बुजुर्गों की सेवा से दूर हो रहा तो पूर्वजों की याद करे यह कैसे संभव होगा?  


फिलहाल यह स्थिति हो गई है कि कई लोग जीते जी अपना तेरहवां व श्राद्ध कर रहे। कभी-कभी लगता है सही भी है उनकी अपनी स्थिति वह स्वयं समझते है क्योंकि बच्चों के पास मां-बाप को रखने और उनके साथ में रहने की स्थिति नहीं तो मरणोपरांत कैसे उनसे उम्मीद रखे। जबकि वर्तमान में पूर्व से ज्यादा माता पिता बच्चों के लिए समर्पित भाव हो गए है, चाहे भौतिक सुख सुविधा हो या उन्हें हाथों हाथ रखने की बात, कारण सीमित परिवार हो गए है। किंतु इसी प्रक्रम में बच्चे यह भी भूल जाते है कि एक समय बाद हमें अपने माता-पिता का ध्यान रखना है उनकी सेवा करनी है क्योंकि उम्र के एक पड़ाव पर उनकी शारीरिक व मानसिक क्षमताएं कम होने लगेगी। जब व्यक्ति की मृत्यु होती है तब घर के सभी लोग गमगीन हो जाते उन्हें खान पान यह सब औपचारिक मात्र लगने लगता है। लेकिन अब समय बदल गया है, हाल ही में एक पार्लर में कुछ महिलाएं फेसिअल व आइब्रो बनवाने आई, बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि उनके ससुर का तेरहवां है मेहमान एकत्रित होंगे इसलिए पार्लर आना पड़ा, मन स्तब्ध सा रह गया, फिर विचार आया समय बदल गया शायद। तभी एक तेरहवें का वाकया भी मन मस्तिष्क में उभरा एक लड़के के पिता का देहांत हुआ था हालांकि जिंदगी भर उन्होंने बेटे को फूलों की तरह पाला-पोसा। बेटे की सर्विस के बाद बहु ओर बेटा अलग रहने लगे एक ही शहर में एक समय बाद पिता की हालत खराब होती गई, पैरालिसिस हो गया और बिस्तर पर आ गए, जगह-जगह बेड सोर हो गए कई महीनों इसी स्थिति में जीते रहे। जिस कमरे में वे थे सिवाए मां के ओर कोई नहीं जाता, हालांकि एक नर्स रखी जो दिन में एक बार डायपर बदल जाती थी पर आखिर कब तक? एक दिन इन सब बातों का अंत हुआ तो सभी नाते रिश्तेदार आए तो बेटा फूट फूटकर रोया और बता रहा था मेने बहुत सेवा की। फिर भी उनका तेरहवां ऐसा लग रहा था धूमधाम से मनाया जा रहा कोई उत्सव है। एक बड़े गार्डन में राउंड टेबल लगी थी साइड एक प्रोजेक्टर पर पिता की कई फोटो के साथ ''सैड सांगÓÓ के साथ वीडियो चल रहा था, जिसे देख रोना आ जाये।


बहरहाल, लगने लगा कि जब अपने अपनो से दूर हो रहे तब व्यक्ति को आत्मा के कल्याण के लिए जीते जी दसवां, तेरहवां, बरसी व श्राद्ध कर लेना चाहिए। पर चिंतनीय है क्या हमारे संस्कार अब यही तक सीमित रह गए कि जिन्हें जन्म दिया वही जीते जी दूर हो रहे तो मरणोपरांत कैसे, क्या मोक्ष प्राप्ति होगी जो अंधविश्वास नही, वैज्ञानिक सत्य है। 


 


*क्या है जिम्मेदारी?*


 


 दो रास्तों पर चलती जि़न्दगी का सफर भृम जाल उत्पन्न करता है। बाल्यवस्था से संस्कारों की महत्ता और जानकारी बच्चों को देना आवश्यक है। श्राद्ध पूर्वजों की श्रद्धा से पूजन करना और उसके वैज्ञानिक महत्व को समझाना कि आत्मा कभी मरती नहीं। इस संसार में पूर्वज किसी न किसी रूप में विद्यमान है। उनकी तृप्ती करना वैज्ञानिक सत्य है, पूर्वज भी हमारें द्वार हमें देखने आते हमारी खैरियत जानने के लिए ओर आशीर्वाद देने के लिए। सिर्फ मन और कर्म का ये संयोजन कई सकारात्मक तारों को जोड़े रखता है। जीव आत्मा की तृप्ति वातावरण को सहज बनाती है व कार्यों की सफलता में सहयोग करती है। क्योंकि आत्माएं भी नकारात्मक नहीं सकारात्मक परिणाम देती है यदि आप स्वयं उनके लिए सकारात्मक हो।


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