बेरी ऊबो थरथर कांपे सुन राणा री हुंकार’, राणा पूंजा की जयंती पर पुष्पांजलि 

‘बेरी ऊबो थरथर कांपे सुन राणा री हुंकार’, राणा पूंजा की जयंती पर पुष्पांजलि 



उदयपुर, 05 अक्टूबर। ‘बेरी ऊबो थरथर कांपे सुन राणा री हुंकार। तीर कामड़ी गोफण लेके ऊबा भील वीर सरदार।।’ विश्व की सबसे प्राचीन अरावली पर्वत श्रंखला में वाकल, सोम व साबरमती नदियों के उद्गम स्थलों के संधीय भोमट के पठार में जन्मा भारतीय संस्कृति का एक जनजाति रक्षक-राणा पूंजा भील ने महाराणा प्रताप के साथ मिलकर क्षात्रधर्मी पथ का राष्ट्र व संस्कृति सेवा के रूप में अपने धर्म का वरण किया। 


 


राणा पूंजा मेवाड़ एक भील योद्धा थे, जिन्होंने हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप का साथ दिया था। युद्ध में पूंजा भील ने अपनी सारी ताकत देश की रक्षा के लिए झोंक दी। हल्दीघाटी के युद्ध में मुगलों की सेना के पैर उखाडऩे में इन भील योद्धाओं की गुरिल्ला युद्ध प्रणाली ही काम आई थी, जिसे पूंजा भील के नेतृत्व में काम में लिया गया। ऐसे राणा पूंजा की जयंती पर सोमवार को राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद् के कार्यकर्ताओं ने पुष्पांजलि अर्पित की। कार्यकर्ता कोरोना संक्रमण से बचाव की गाइड लाइन का पालन करते हुए राणा पूंजा चौराहा (रेती स्टैंड) पहुंचे। वहां माल्यार्पण कर देशभक्ति के नारे लगाये गये।



नगर समिति के मंत्री संदीप पानेरी ने बताया कि राणा पूंजा ने देश के लिए लगातार संघर्ष किया वे महाराणा प्रताप के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। देश के लिए उनका संघर्ष अमूल्य है। रा.व.क.परिषद् उन के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए जनजाति समाज में जागरण कर उन्हें देश की मुख्यधारा में जोड़ रही है। इस मौके पर प्रांतीय कोषाध्यक्ष रमेशचन्द्र मून्दड़ा, प्रान्तीय छात्रावास प्रमुख नक्षत्रलाल नागौरी, सह छात्रावास प्रमुख नरेन्द्र कुमार, प्रांतीय कार्यालय प्रमुख सोहनलाल, बप्पारावल के प्रकाशक मनीष गुप्ता सहित कई कार्यकर्ता मौजूद रहे। 


इधर, प्रताप गौरव केंद्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ में भी पुष्पांजलि कार्यक्रम का आयोजन हुआ। पुष्पांजलि कार्यक्रम आयोजन समिति के पुष्कर गमेती ने बताया कि पुष्पांजलि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केन्द्र के निदेशक अनुराग सक्सेना थे। उन्होंने कहा कि राणा पूंजा ने अपने भील सैनिकों के साथ अपनी रण कुशलता एवं छापामार युद्ध में तज्ञता का परिचय देते हुए महाराणा प्रताप का साथ दिया। उनके अतुलनीय योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। महाराणा प्रताप ने भी राणा पूंजा सहित सम्पूर्ण समाज का मान बढ़ाया और आज भी मेवाड़ का राजचिह्न इसका साक्षी है।


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