हाथरस दोषी कौन - प्रशासन, राजनीति या अपराधी ?

हाथरस दोषी कौन - प्रशासन, राजनीति या अपराधी ?



       भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की जन्मभूमि कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में विगत कुछ दिनों से जो हो रहा वो काफी निंदनीय है, 20 साल की एक बेटी जिसके साथ अमानवीय घटना घटने के बाद उसकी मौत हो जाती हैं और उसका दाह-संस्कार आनन-फानन में रात में ही बिना उसके परिवार के मर्ज़ी के प्रशासन द्वारा ज़ोर-ज़बरदस्ती से रात में कर दिया जाता हैं (एक वर्ग ये भी कहता है की लड़की की दाह-क्रिया परिवार के मर्ज़ी से और उनके उपस्थिति में हुआ, इस बात में कितना सच मन जाए जबकि सूर्यास्त के बाद शव का दहन वर्जित है हमारे समाज में) दूसरी तरफ प्रशासन ये कह रहा है कि कानून व्यवस्था नहीं बिगड़े इसके लिए शव को रात में दहन किया गया, तो ये सवाल मन में उठ जाता हैं कि जो पुलिस बल आज जुटी है पीड़िता के परिवार को लोगो को ना मिलने से रोकने के लिए, यदि शव का दाह-संस्कार सुबह होता तो क्या वो पुलिस बल कानून व्यवस्था सही रखने के लिए काम नहीं कर सकती थी, यदि पुलिस बल कम पड़ती तो सेना बुला लेते, दूसरे राज्यों से फ़ोर्स की मदद मांग लेते आखिर अपनी नाकामयाबी को छुपाने के लिए उस परिवार को पीड़िता के शव को धार्मिक संस्कारों के साथ दाह-संस्कार से क्यों वंचित किया गया?


                  जैसे घर के किसी सदस्य के गलत कार्य के कारण समाज उस परिवार के मुखिया को भी दोषी मानता है कि कहीं न कहीं मुखिया के द्वारा परिवार के संचालन में कोई कमी रह गई, ठीक वैसे ही प्रदेश या देश में जो कुछ अमानवीय घटना घटित होती है तो उसकी भी ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को लेनी होगी और उसके प्रति जवाबदेही भी देनी होगी ।                                   


                लड़की के साथ बलात्कार हुआ या नहीं इस पर भी अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं, प्रदेश के एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) प्रशांत कुमार का कहना है कि फ़ोरेंसिक रिपोर्ट में ये साफ़ कहा गया है कि महिला के साथ रेप नहीं हुआ, बल्कि मौत का कारण गर्दन में आई गंभीर चोंट हैं, चलो मान लेते हैं एक बार कि बलात्कार नहीं हुआ, लेकिन एडीजी साहब कुछ तो हुआ गलत उस लड़की के साथ जिसके कारण देश कि युवा बेटी मौत के मुँह में गयी, कही न कही चूक तो ज़रूर हुई आपके प्रशासन से, अमानवीय घटना के बाद परिवार के साथ हमदर्दी के बजाय उस परिवार को उसके बेटी कि अंतिम-क्रिया भी सही ढंग से ना करने दिया आपके प्रशासन ने, और तो और जो कथित तौर पर वीडियो वायरल हुआ वहां के डीएम प्रवीण कुमार का ये कहते हुए कि "आप अपनी विश्वसनीयता ना खोये मीडिया का क्या हैं, आज साथ है कल चली जायेगी हम-आप यही रहेंगे" इससे क्या बताना चाहती है एडीजी साहब आपकी प्रशासन और तो और टीवी चैनलों पर निभर्या के वकील रही सीमा कुशवाहा और एसडीएम जेपी सिंह कि जो झड़प दिख रही थी उससे साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि हाथरस के लोकल प्रशासन पर कुछ तो दबाव है ऊपर से, ये दबाव कहाँ से और किसका है ये उत्तर प्रदेश के मुखिया तय करें, अन्यथा मुख्यमंत्री जी जनता आने वाले सालों में तय कर देगी ।


                    सरकार ने गृह सचिव के स्तर पर एसआईटी का गठन कर दिया और एक हफ्ते के अंदर रिपोर्ट देने को कहा जिससे इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जा सके और जल्द से जल्द न्याय हो, सरकार का ये निर्णय क़ाबिले तारीफ है लेकिन जिस तरह से अब तक लोकल प्रशासन का रवैया (एफ़आईआर लिखने में आठ दिन लेना, जिलाधिकारी का कथित वीडियो कहते हुए कि-मीडिया का क्या, आज साथ है कल चली जायेगी हम-आप यही रहेंगे, और जब पीड़िता की जान जाती है तो आनन फानन में उसके शव को रात में ही जला दिया जाता है) रहा है उससे आम जनमानस को नहीं लगता की वही जिले के आला-अधिकारी वहां रहेंगे तो कोई भी टीम निष्पक्ष जांच कर पाएगी, अतः मामले की जांच होने तक के लिए इन अधिकारियों को वहां से हटा देना चाहिए या फिर इस मामले से दूर रखना चाहिए, और तो और पीड़िता के परिवार को और जनता को सरकार से मांग करनी चाहिए की पूरे मामले की करवाई सीसीटीवी कैमरे के अंतर्गत हो ताकि पीड़िता के परिवार पर किसी प्रकार का किसी दबाव ना हो।


                       हाथरस में हुई इस घटना का विरोध विभिन्न राजनैतिक दल कर रहे है स्वभाविक है करना भी चाहिए अपराध और अपराधी का विरोध हम सब को, चाहे अपराध बलात्कार का हो चाहे कोई और अपराध हो, अपराध तो अपराध होता है और उसका विरोध सबको करना चाहिए। हाथरस की घटना का ही क्यों आजमगढ़, बलरामपुर और फतेहपुर, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, झारखंड इत्यादि जगहों पर हो रहे बलात्कार के विरोध पर आवाज़ उठाना चाहिए, अपराध तो वहा भी हुआ हैं, देश की हर एक बेटी को न्याय मिलाना चाहिए। बार- बार टीवी चैनलों के माध्यम से विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं से सुनने में आ रहा की पीड़िता दलित जाति से और अपराधी सवर्ण जाति से है उन प्रवक्ताओं से बस इतना कहूँगा कि अपराध,अपराधी और पीड़ित / पीड़िता की कोई जाति, धर्म, मज़हब नहीं होता हैं। अपराध रुकना चाहिए,अपराधी को उसके किये की सजा मिलना चाहिए और और पीड़ित / पीड़िता के साथ न्याय होना चाहिए, चाहे वो किसी जाति, धर्म, मज़हब से आते हो, आप सब बंद करिये जाति -धर्म के नाम पर राजनीति करना।


                      हम उस देश में रहते है जहां पर नारी सम्मान में कहा जाता है "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" और उसी देश के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2018-19 के सर्वे के अनुसार भारत में हर छह घंटे में एक लड़की का बलात्कार हो जाता है (ये तो सरकारी आकड़ों के अनुसार है , कुछ ऐसे भी मामले होते होंगे जहां पीड़िता कि बात दर्ज नहीं हो पाती होगी या सामाजिक लोक लाज कि दुहाई देकर बात दबा दिया जाता होगा), बलात्कार पीड़ितों में ज्‍यादातर की उम्र 18 से 30 साल के बीच है, हर तीसरे पीड़िता की उम्र 18 साल से कम है। वहीं, 10 में एक पीड़िता की उम्र 14 साल से भी कम है, आखिर क्या कारण है की देश में नारी के साथ इतना अपमान हो रहा हैं कही न कही इसका मुख्य कारण हमारी अपनी संस्कृति से विमुख होना भी है। अतः सरकार को चाहिए की व्यावसायिक शिक्षा के साथ-साथ शिक्षा में आध्यात्मिक और सामाजिक शिक्षा को भी शामिल करें पाठ्यकर्म में और टीवी चैनलों, इंटरनेट इत्यादि पर उपलब्ध बलात्कार को बढ़ावा देने वाले सामग्रियों पोर्न वीडियो, फोटो इत्यादि को यथा शीघ्र हटा दे क्योंकि एक कहावत सबने सुनी है- जो जैसा देखता है, वैसा ही सोचता है और ठीक वैसा करने का प्रयत्न भी करता है। युवतियों को उनके सुरक्षा हेतु ट्रेनिंग भी प्रदान करें सरकार जिससे देश में पुनः बलात्कार की घटनाएँ ना के बराबर हो। आज के नारी दशा पर बस इतना ही कहना शेष हैं -


"अबला जीवन नारी तेरी यही कहानी, आँचल में तेरे दूध और आँखों में हैं तेरे पानी।"



*अंकुर सिंह*


चंदवक, जौनपुर, उत्तर प्रदेश


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