*हसो नहीं प्रसन्न रहो*

*हसो नहीं प्रसन्न रहो*


कोडरमा 9 अक्टूबर । परम् पूज्य उपसर्ग विजेता गणाचार्य श्री 108 विराग सागर  महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में बताया की हंसना भी एक कशाय  है और जेनागम में कशाय करना अच्छा नहीं माना जाता प्रसन्न रहना तो गुण है किंतु हंसना दुर्गुण माना गया है हंसना राग का और क्रोध करना द्वेष का प्रतीक है इसी कारण जेनागम में हसमुख उग्र दृष्टि या रूद्र मुद्रा बाली प्रतिमा प्रतिष्ठा के योग्य नहीं मानी जाती और यदि अज्ञानता बस प्रतिष्ठा हो भी जाए तो प्रतिष्ठा करने वाले व कराने वाले के लिए हानिकारक हो जाती हैl अतः पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के समय प्रतिष्ठाचार्य इन सब बातों को ध्यान रखते हैं लौकिकता में देखा जाता है कि उच्च महापुरुष सज्जन पुरुष सदैव प्रसन्न रहते हैं लेकिन हस्ते नहीं है प्रसंता मन की विशुधी का प्रतीक है इसलिए सदैव प्रसन्न रहने का प्रयास करना चाहिए कहा भी जाता है हंसे तो फंसे हंसने वाले व्यक्ति के भावों का कोई भरोसा नहीं रहता कि उसके मन में क्या चल रहा है कब उसके भाव बिगड़ जाएं और सामने वाले के लिए अहितकारी हो जाएं जैनाचार्य कहते हैं राग द्वेष से दूर वितराग मुद्रा ही कल्याणकारी है अतः बैरागी साधु जन सबके बीच रहते हुए भी अनासक्त होकर रहते हैं कहने का तात्पर्य है कि हम अपने मन को गंगाजल के समान छल कपट राग द्वेष विषय कषायो को रहित निर्मलकर वीतराग के मार्ग का अनुसरण करने वाले सच्चे भावलिंगी संतों की शरण का आश्रय कर अपने जीवन को पावन व पवित्र करें l                 ( कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा, नवीन जैन)


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