बड़े भाई ' राजू बना ' की पुण्यतिथि पर उन्हें भावुक नमन

 बड़े भाई ' राजू बना ' की पुण्यतिथि पर उन्हें भावुक नमन


         बेहद सौम्य, सरल व्यक्तित्व के धनी स्वर्गीय राजेन्द्र सिंह  कुड़ली की आज 23वीं पुण्यतिथि है। एक सड़क हादसे ने मेरे से ही नहीं बल्कि दिनेश शर्मा, अजीत सिंह राठौड़, राधेश्याम सिंह तंवर, गिरिराज खंडेलवाल, पूरण सिंह कुड़ली, उदयसिंह खरेरिया सभी से 3 नवंबर, 1997 को उनका बड़ा भाई और मार्गदर्शक छीन लिया। ' राजू बना ' के सिर्फ हम लोग ही आत्मीय नहीं थे...उनका दायरा बहुत बड़ा था। उनका व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि जो कुछ भी मैं लिखूंगा, वे उस सबसे बढ़कर थे। उनके असमय निधन से बहुत लोगों की जिंदगी में जो रिक्तता आयी, वह कभी नहीं भर सकी।


आज उनकी पुण्यतिथि पर जयपुर में मोतीनगर, अजमेर रोड स्थित उनके आवास पर सुबह 10 बजे पुष्पांजलि कार्यक्रम भी रखा गया। जिसमें अजीत सिंह राठौड़ पत्रकार, विजेन्द्र सिंह मोहनवाड़ी सरपंच, विजय व्यास, रघुराज सिंह कुड़ली, पूरण सिंह कुड़ली, जयपुर शहर युवक कांग्रेस के महासचिव नगेन्द्र सिंह कुड़ली, रघुवीर सिंह नेताजी, भवानी सिंह राठौड़, महावीर सरोज, राकेश शर्मा, तेज सिंह कुड़ली, अभिजीत सिंह सिकरवार, जितेन्द्र सिंह इंदौखा, बाबू सिंह चौहान, शेलेन्द्र सिंह चौहान, कुलदीप सिंह राठौड़, हिम्मत सिंह, पवन शर्मा, सुरेश शर्मा, सुशील शर्मा, शेलेन्द्र सिंह थल, विजेन्द्र सिंह आदि ने ' राजू बना ' को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।



     राजेन्द्र कुड़ली जी की स्मृति दिल में सदैव जीवित है। उनके निधन से प्रदेश ने एक बेहद ऊर्जावान और स्वाभिमानी युवा नेता को भी खो दिया जिसमें भविष्य की असीमित संभावनाएं थीं। युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष डॉ.रघु शर्मा ने वर्ष 1989 में राजेन्द्र कुड़ली को प्रदेश युवक कांग्रेस का महासचिव बनाया था। लेकिन सिर्फ उनकी यही पहचान नहीं थी, उनका कद अपने इस पद से बहुत ऊँचा था। यदि आज वे होते तो अपने राजपूत समाज, कांग्रेस पार्टी और मारवाड़ में एक प्रखर एवं ईमानदार नेतृत्व की मिसाल सिद्ध होते।


   जयपुर में स्कूटर पर चलते, सभी से जिंदादिली से मिलते, चाय की थड़ियों पर अपनों से बतियाते ' राजू बना ' को देखकर कोई अंदाज नहीं लगा सकता था कि इस व्यक्ति की सामाजिक व राजनीतिक पृष्ठभूमि बेहद दमदार है। जिसका उन्हें कभी गुमान नहीं हुआ।


         अस्सी के दशक में जयपुर के श्री राजपूत छात्रावास से वे एक ऊर्जावान युवा नेतृत्व के रूप में उभरे थे और उनमें समाज व राजनीति के क्षेत्र में कुछ करने की तीव्र ललक थी। मैं अपने कॉलेज के दिनों से उनके संपर्क में आया और उनका मुरीद हो गया। 


       उनमें संगठनकर्ता, समन्वय, स्पष्टवादिता का विलक्षण गुण था। उनकी इस प्रतिभा को केन्द्रीय मंत्री रहे कल्याण सिंह जी कालवी ने पहचाना। देश के प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर जी सहित उस दौर में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं माधवराव जी सिंधिया, राजेश पायलट जी, मप्र के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह जी ने भी इस साहसी व जुझारू युवा में भविष्य के नेतृत्व की संभावना देखी। 


* (एक फोटो साझा कर रहा हूं, उसमें पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के साथ पूर्व कैबिनेट मंत्री व दिग्गज भाजपा नेता राजेन्द्र राठौड़ हैं तो दूसरे राजेन्द्र कुड़ली, उस दौर में दोनों युवा नेता थे। )


राजेन्द्र जी कुड़ली समाज व राजनीति में एक नई संभावना बनकर उभर रहे थे। उनके अनेक करीबी मित्रों ने आगे चलकर सफलता के शिखर छुए जैसे कि पूर्व विधायक प्रेम सिंह बाजोर, मेघराज सिंह रॉयल, स्व. दिलीप सिंह चंडालिया। 


 उनके आत्मीय मित्रों का दायरा बहुत बड़ा रहा। इसमें स्व. महेन्द्र सिंह राजावत, स्व. ओमसिंह राठौड़ श्यामपुरा, करण सिंह खाचरियावास, रामसिंह रानोली, सूरज नवलखा, स्व. मोईन भाई कुछ नाम भर हैं। उनके मित्रों का संसार जयपुर ही नहीं दिल्ली, पंजाब, यूपी, मप्र, महाराष्ट्र तक फैला हुआ था। 


    नागौर जिले के डीडवाना के कुड़ली गांव में जन्मे राजेन्द्र सिंह राठौड़ ने अपने सरनेम में गांव का नाम जोड़ा। जब वे जयपुर पढ़ने आये तो कुछ ही वर्षों में उन्होंने अपनी परिपक्वता, सक्रियता से सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान बनाया। राजेन्द्र जी कांग्रेस से जुड़े और पूर्व मुख्यमंत्री स्व. हरिदेव जी जोशी, पं. नवलकिशोर जी शर्मा सभी के आत्मीय रहे। पूर्व सांसद विष्णु मोदी, राजनेता चंद्रराज सिंघवी उनके घनिष्ठ मित्रों में थे।


     राजेन्द्र जी के करीबी मित्र व स्वतंत्र पत्रकार अजीत सिंह राठौड़ उन्हें याद करते हुए अक्सर कहते हैं कि ' राजू बना ' एक अनूठे व्यक्तित्व थे। उनके साथ स्कूटर पर शहर का एक दौरा करने भर से मालूम चल जाता था कि इस शख्स की ऊँचाई क्या है। लोग उन्हें प्रेम से ' समझौता किंग ' भी कहते थे। लोगों के गिले-शिकवे खत्म कराने में वे माहिर थे। एमआईरोड पर गुलाबजी चायवाले ने उनसे कभी पैसे नहीं लिए। राजेन्द्र जी उनके यहां जाते तो गुलाब जी भावुक हो जाते और कहते " राजू बना, आपसे पैसे नहीं ले सकता। " यही स्थिति वीनस बेकरी और कई जगह थी। उनसे लोग जज्बाती तौर पर जुड़ते थे।


         जयपुर शहर युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष दिनेश शर्मा उनके संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं कि राजेन्द्र जी के पास स्कूटर था। लोग कहते कि ' राजू बना ' कोई बड़ी गाड़ी ले लो। इस पर वे ठहाका लगाकर कहते कि ' अपने दोस्त तो शहर की गलियों में रहते हैं। इन गलियों के लिए स्कूटर ही ठीक है। ' वे अपने इसी सहज, सरल व्यवहार की वजह से सर्व समाज में लोकप्रिय हुए। जिस दौर में लोगों के पास मोबाइल नहीं था, उस दौर में भी राजेन्द्र जी अपने संपर्क निभाने में कभी पीछे नहीं रहे। मिलनसारिता का उनका यह गुण बेमिसाल था। ' 


       राजेन्द्र जी का ' सेंस ऑफ हृूयमर ' गजब का था। उन्होंने जिंदादिल शख्सियत राधेश्याम सिंह जी तंवर को स्नेह- भाव में ' राजा मांडा ' की उपमा दी और कहा कि ' राजा मांडा सबको मिठाई खिलायेंगे। ' लेकिन दोस्तों ने इस बात पर कई महीनों मिठाई खायी और यह उपमा इतनी मशहूर हुई कि लोग राधेश्याम जी को ' राजा मांडा ' नाम से ही पुकारने लगे।


    कांग्रेस नेता गिरिराज खंडेलवाल की नजरों में ' राजू बना ' किसी अलग दुनिया के व्यक्त थे...बिल्कुल दरवेश। वे अपने दोस्तों को आगे बढ़ाते गए...कभी किसी की पीठ पीछे बुराई नहीं की, जो कहते सामने कहते। ऐसे लोग मिलना दुर्लभ हैं...खरे और निडर।


     उनके बेहद करीबी साथी और उनके गांव के ही पूरण सिंह कुड़ली कहते हैं कि ' राजू बना ' अपने बारे में कभी किसी को कुछ नहीं बताते थे। वे कहते थे कि ' मैं चाहता हूं लोग मेरे व्यवहार की वजह से मुझसे जुड़ें और मैं अपनी मेहनत से आगे बढूं। ' 


इसलिए उन्होंने आगे बढ़ने या अपना प्रभाव जमाने के लिए अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि का कभी इस्तेमाल नहीं किया।            


      उनकी जोधपुर राजपरिवार में भी करीबी रिश्तेदारी रही। पूर्व महाराजा गजसिंह जी के दादा महाराजा उम्मेद सिंह जी की पत्नी यानी महारानी साहिबा ने भारतीय सेना के युवा अधिकारी भागीरथ सिंह राठौड़ के तेजस्वी व्यक्तित्व को देखकर पूछा था कि यह सैन्य अधिकारी कौन है... और उन्होंने अपनी भतीजी के लिए उस युवा को पसंद किया और विवाह कराया।


     उन्हीं स्व. भागीरथ सिंह जी के बड़े पुत्र ठाकुर सुल्तान सिंह जी राठौड़ कुड़ली में ही रहते हैं जबकि छोटे पुत्र राजेन्द्र सिंह जी कुड़ली थे। राजेन्द्र जी के पुत्र रघुराज सिंह कुड़ली जयपुर में रहते हैं और भतीजे रविन्द्र सिंह दुबई में बस गये हैं। ये दोनों युवा भी समाज के लिए बेहद समर्पित हैं। 


हाड़ौती के दिग्गज कांग्रेस नेता व पूर्व मंत्री भरतसिंह जी कुंदनपुर भी स्व.राजेन्द्र जी के निकटतम रिश्तेदार हैं। लेकिन राजेन्द्र जी ने जयपुर में अपनी पहचान अपने बलबूते


 बनाने की ठानी। जिंदगी के संघर्षों ने उन्हें उभारा। बहुत सहज भाव से पक्के उसूलों के साथ जीये । हमेशा लोगों की भलाई, समरसता को ही जिंदगी का ध्येय बनाए रखा।


     ईश्वर की ऐसी कृपा रही कि वे अपनी भावनाएं मुझसे साझा करते थे। एमएलए क्वाटर्स् की चाय की थड़ियों पर हम कोई कोना ढूंढ़ कर बातों में मग्न हो जाते। वे कहते थे कि ' मेरे पिता ने फौज में नाम कमाया। मेरे पुरखे भी जोधपुर दरबार की पराक्रमी राठौड़ों की घुड़सवार सेना में दक्खन में बीजापुर, गोलकुंडा तक जाकर वीरता से लड़े। वह साहस मेरी रगों में है। मैं आगे बढूंगा तो अपने स्वाभिमान, मर्यादा से ही बढूंगा, कोई समझौता नहीं करूंगा। ' 


   अपने ऐसे ही दृढ़ संकल्प की वजह से वे देश के दिग्गज राजनेताओं के करीब रहे। 


उनका असमय निधन बहुत लोगों को हिला गया। 


उनके मित्र डॉ. रिजवान अली बहुत भावुकता से याद करते हैं कि " राजेन्द्र जी इतने सहज थे कि उनके प्रशंसकों में बड़े लोग ही नहीं बल्कि मिस्त्री, ड्राइवर, आटोरिक्शा चालक, नगीनची, मजदूर, हॉकर, वेटर सभी की भरमार थी। जब उनका निधन हुआ तो जयपुर शहर में बहुत से चाय के ठेले और पान की थड़ी वाले भी रोये। वहीं बड़े- बड़े नेताओं की पलकें नम हो उठी। "


कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ' राजू बना ' को याद कर हर दिन भावुक हो उठते हैं, उनमें मैं भी एक हूं। वे मेरे लिए बड़े भाई से भी बढ़कर थे...मेरी जिंदगी में बहुत लोग आये...मददगार बने। लेकिन कोई ' राजू बना ' जैसा जज्बाती रहबर नहीं आया...ना मैंने किसी को उनकी जगह लेने की इजाजत दी। मैंने जिंदगी में उन जैसा बनने की सोची थी...बन नहीं सका...सच है, हर कोई ' राजेन्द्र कुड़ली ' नहीं हो सकता...वे अलग ही मिट्टी के अद्भुत इंसान थे।


- कुलदीप शर्मा।


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