गाय ,कंडे ओर आत्मनिर्भरता

 गाय ,कंडे ओर आत्मनिर्भरता

      (लेखिका निवेदिता मुकुल सक्सेना झाबुआ मध्यप्रदेश) 


प्राचीन समय मे घर बनाने (लीपने) के माध्यम से लेकर ईंधन के उपयोग स्वरुप गाय के गोबर का उपयोग किया जाता रहा, वही कृषि मे भी बहुआयामी रुप से कारगर रहा ।बात हम गाय के गोबर के गुणो की ही  नही कर रहे वरन शुरुआत से लेकर वर्तमान तक उसके विकास की बात कर रहे शायद ये बहुत छोटी बात हो सकती हैः 

             कुछ वर्षो पुर्व मेरे मायके इंदौर मे घर के पास एक सुप्रसिद्ध मन्दिर जाते हुये लगतार कई दिनो तक मन्दिर जाते वक्त देखने मे आया की अल सुबह मन्दिर के पास काफी सारी गायें लाई जाती ओर उनके साथ चारा भी आता ओर कुछ कंडे भी जो व्यक्ति गाय लाता उससे मन्दिर के कई भक्त चारा खरीद कर उन  गायो को खिलाते साथ ही गाय जो गोबर करती वह भी उठा कर एक टब मे रख लिया जाता कुछ लोग कंडे जिसकी तब कीमत दस रुपये थी वह खरीद कर ले जाते ।अच्छा लगा गाय हमारी ,चारा हमारा ,ओर कंडे भी हमारे ओर वही चारा वह भी दस रुपये में बेचकर मुनाफे के साथ गाय का भोजन भी हो गया ओर उसके गोबर से बने कण्डो से भी मुनाफा। मन प्रफुल्लित हुआ एक बहू आयामी आत्मनिरभरता मेरी नजर मे आई जिसकी कीमत शहरो मे सबसे ज्यादा है लेकिन उसकी स्थापना गांव मे। वही हाल ही मे एक समूह से जुड़ना हुआ सेवा कही भी कभी भी इस समूह को निस्वार्थ भाव के साथ  सक्रियता से चला रहे अरिष्ट देशलहरा जो की सडक के जानवर कुत्ते या गाय या कोई भी पशु का भरण पोषण व बीमार होने पर उनकी दवा का इंतजाम भी बिना किसी दान के स्वयं करते चर्चा के दौरान उन्ही से ज्ञात हुआ की आज गाय के घी के भाव सत्ताइस सौ रुपये है ओर गाय का घी केन्सर पेशेंट के लिये वरदान स्वरुप है। बात यही खत्म नही होती उनके समाज सेवी संगठन द्वारा गौ शाला मे सेवा दी जाती ओर ये संगठन सैकडों लोगो की प्रेरणा बन रहा जिससे गांव गांव शहर शहर गौ शाला का निर्माण हो सके। 

                   मेरी मम्मी (इन्दौर मे) रोज गाय को सुबह का पहला भोजन खिलाती थी लेकिन कुछ वर्षो से वहाँ सडको पर जानवर प्रतिबन्धित हो गये व विकल्प स्वरुप निगम द्वारा हर घर से गाय के लिये जो भी खाना निकला हो वह हर गली मे बनाये गये एक बॉक्स मे डाल दिए जाते जिसे वहा का सफाई कर्मी उठाकर ले जाते ओर उनके अनुसार वह गाय खाना तक पहुच जाता बात काफी विचारणीय है ओर मम्मी जेसे कई लोगो के लिये संतुष्टिकारक भी नही ।  उनकी चिंता का वाजिब भी है जहा लोग घर के भोजन की पहली रोटी गाय को खिलाते वही अब सिर्फ बॉक्स मे रख संतुष्ट होना।क्या गारंटी है खाना गाय को ही मिलेगा।

      बहरहाल ,आखिर गाय इतनी महत्वपूर्ण हैं ये तो हम सभी जानते जिनके गुण हमारे वेदो से लेकर उत्पाद की जानकारी व चिकित्सा जगत मे उपयोग राजीव जी दिक्षित से लेकर चर्चित गुरु रामदेव जी बाबा,आशाराम जी बापू व अन्य साधू सन्तो द्वारा इनके उत्पादो के व्यवसाय को बाजर मे लाकर लोगो को प्रकृति से जोडा है।

हाल ही  दिवाली पर  हमारे अंचल की ही बहन  रीना शर्मा द्वारा गाय के गोबर से "संवृद्धि दीपक " तैयार किये गये, जो गाय के घी,दही व ग्वार पाठा के मिश्रण से बनाये गये । बात गाय के गुण गान की नही वरन उसका हमारी भारतीय संस्कृति के अनुरूप जुडाव की है जो चाहे आध्यात्म या चिकित्सकीय पहलुओं को हमारे समक्ष रखता आया हैं।फ़िलहाल, कोरोना काल हमारी जीन्दगी को जहा अत्यंत चिंतन मे डाल रहा वही कुछ सकारत्मक तथ्यो को समाधान सहित हमारे समक्ष रख रही।


      -जिम्मेदारी हमारी-    


* गाय के गोबर मे मिथेन गैस होती है जो ज्वलनशील होती है इस कारण इसके कण्डो का उपयोग ईंधन मे करना फायदेमंद होता हैं।


* गोबर का उपयोग आधुनिक रुप से "बायो गैस "के मॉडल के रुप मे सस्ते ईंधन को उतपन्न कर गांव मे विकास के रस्ते आसान किये जा सकते है।


* गाय का दुध से डेरी उत्पादन कर विभिन्न उत्पाद जैसे  घी, पनीर, दही,चक्का,छांछ आदि तैयार कर शानदार सदाबहार व्यवसाय किया जा सकता है।

*शहरो मे कंडे बहुत मुश्किल से व महँगे मिलतें हैं ऐसे मे इसकी डिमांड समझना जरुरी हैं।

* कार्बनिक कृषि मे भी अच्छी भुमिका सिद्ध होती हैं।

*गोबर से अन्य विभिन्न उत्पाद जैसे धुपबत्तीअन्य सुंगंधित तत्व मिलाकर  बनाये जा सकते है।

 *कैंसर रोगी को भी गाय के सम्पर्क मे लगातार रहने से रोग की रोकथाम की जा सकती हैं।

 *प्रशासन को भी लोगो की अध्यात्मिक भावनाओ को समझते हुये हर गांव, कॉलोनी के निकट गौ शाला का निर्माण अवश्य करवाना चाहिये जिससे गायो को आश्रय व जन जन का कल्याण भी होगा।    *

  *आत्मनिर्भरता का ये भी नया आयाम है जो समझ कर कार्यरूप में परिणित किया जा सकता है।   

रिपोटर चंद्रकांत सी पूजारी

      

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