अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन

अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन




77 वर्ष के जो बाइडेन का राजनीतिक कैरियर पांच दशक यानी 50 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है। वे 1973 में पहली बार अमेरिका के सांसद बने थे। जो बाइडेन का जन्म 20 नवंबर 1942 को पेंसिल्वेनिया के स्क्रैंटन में हुआ था। जो बाइडेन का पूरा नाम 'जोसेफ रॉबिनेट बाइडेन जूनियर' है। इन्हें 'मिडिल क्लास जो' भी कहा जाता है।क्योंकि इनका जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ और उन्हें अपने जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा है। जो बाइडेन चार भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। दस वर्ष की उम्र में जो बाइडेन अपने परिवार के साथ डेलावेयर में शिफ्ट हो गए थे। बचपन में जो बाइडेन बहुत हकलाते थे जिसके कारण उनके सहपाठी उन्हें चिढ़ाया करते थे। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यूनिवर्सिटी आफ डेलावेयर से पॉलिटिकल साइंस और इतिहास की पढ़ाई की। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान बहामास में छुट्टियों के समय उनकी मुलाकात अपनी पहली पत्नी नीलिया हंटर से हुई। 25 वर्ष की उम्र में वे राजनीति में आए और 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने सीनेट का चुनाव लड़ा।
          18 दिसंबर 1972 को उनके जीवन में एक बहुत बड़ी दुर्घटना हुई। एक कार एक्सीडेंट में उन्होंने अपनी पत्नी और 13 महीने की बेटी को खो दिया। उनके बेटे बो और हंटर भी इस दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुए थे किंतु इसके बावजूद उन्होंने सीनेट का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
           5 जनवरी 1973 को उन्होंने अस्पताल के बेड से ही डेलावेयर के सांसद के तौर पर शपथ ली तब उनके दोनों बेटे भी उनके साथ अस्पताल में ही भर्ती थे। वे इतनी कम उम्र के गिने-चुने सांसदों में से एक थे।
          पत्नी की मृत्यु के बाद वे अपने बेटों को ज्यादा से ज्यादा समय देना चाहते थे इसलिए वो ट्रेन के जरिए रोज डेलावेयर के वेल्मिंटन से वाशिंगटन तक का 179 किलोमीटर लंबा सफर तय किया करते थे। वह 30 वर्ष तक इसी प्रकार ट्रेन से वाशिंगटन डीसी जाते रहे। परिणाम स्वरूप इस रूट पर कार्य करने वाले रेल के कर्मचारी उनसे इतना घुल मिल गए कि जो बाइडेन अक्सर उन लोगों के साथ ट्रेन में ही पार्टी किया करते थे। जो बाइडेन के नाम पर वेल्मिंटन के रेलवे स्टेशन का नाम भी उन्हीं के नाम पर जो बाइडेन स्टेशन रख दिया गया था।
           जो बाइडेन पिछले 33 वर्षों से अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की कोशिश कर रहे थे। वर्ष 1987 में वे राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए किंतु किसी दूसरे नेता के भाषण की कॉपी करने का आरोप लगने पर उन्हें उम्मीदवार का पद छोड़ना पड़ा। वर्ष 2007 में वो अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की रेस में पुनः शामिल हुए किंतु फिर उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली, लेकिन इस बार बराक ओबामा के साथ 47 वें उपराष्ट्रपति बनकर व्हाइट हाउस पहुंचने में वो सफल हुए।
            बाइडेन का 47 वर्ष पुराना कैरियर विवादों से भरा रहा है। वर्ष 1978 में उन्होंने एक विवादित कानून का समर्थन किया था और वर्ष 2002 में उन्होंने इराक युद्ध के समर्थन में अपना वोट डाला था, हालांकि इस साल उन्होंने इसे अपनी गलती माना है‌। उन्हें 'क्रीपी जो' कह कर भी बुलाया जाता है। क्रीपी गलत व्यवहार करने वाले व्यक्ति को कहते हैं। बाइडेन पर भी कई महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने के आरोप लग चुके हैं। वर्ष 1978 में उन पर रंगभेदी होने के भी आरोप लगे थे और वर्ष 1994 में उन्होंने अपराध रोकने के लिए एक विवादित कानून का समर्थन किया, जिसके बारे में कहा जाता था कि इसके जरिए अश्वेतों को निशाना बनाया जाएगा।
           अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के रूप में चुने गए जो बाइडेन वर्ष 2008 में उपराष्ट्रपति बनने से पहले भारत के साथ मजबूत संबंधों के पक्षधर रहे हैं और अमेरिका की विदेश मामलों की कमेटी का चेयरमैन रहते हुए उन्होंने भारत के साथ संबंधों को लेकर एक विशेष रणनीति भी बनाई थी। वर्ष 2006 में उन्होंने यहां तक कहा था कि उनका सपना है कि वर्ष 2020 तक भारत और अमेरिका सबसे गहरे मित्र बन जाएं। ये बातें उन्होंने तब कही थीं जब वह अमेरिका के उपराष्ट्रपति भी नहीं बने थे‌। वर्ष 2008 में भारत और अमेरिका में होने वाली न्यूक्लियर डील में भी जो बाइडेन की बड़ी भूमिका थी, इसके लिए उन्होंने न सिर्फ बराक ओबामा को तैयार किया था जो उस समय सांसद थे बल्कि इसके लिए उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों को भी राजी किया था। बाइडेन और ओबामा प्रशासन के दौरान अमेरिका ने पहली बार भारत को अपना बड़ा डिफेंस पार्टनर माना और इसी वजह से भारत को रक्षा के क्षेत्र में नई और एडवांस टेक्नोलॉजी मिलने की राह आसान हुई। पहली बार अमेरिका ने नाटो के बाहर किसी गैर नाटो देश को ये दर्जा दिया था। वर्ष 2016 में जब जो बाइडेन अमेरिका के उपराष्ट्रपति बने तब भारत और अमेरिका के बीच 'लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट' हुआ था, जिसके बाद अमेरिका और भारत एक दूसरे के रणनीतिक सहयोगी बन गए थे। इस समझौते के बाद भारत और अमेरिका को एक सप्लाई सर्विसिंग और स्पेयर पार्ट्स के लिए एक दूसरे के मिलिट्री बेस इस्तेमाल करने की इजाजत मिल गई थी। 
        आतंकवाद पर भी जो बाइडेन का रवैया काफी सख्त माना जाता है, जो कि भारत के लिए अच्छी बात है लेकिन चीन के मुद्दे पर बाइडेन का रुख अभी साफ नहीं है। इमिग्रेशन और एच-1 वीजा के मुद्दे पर भी बाइडेन संभवतः नर्म रुख अपना सकते हैं।


                            रंजना मिश्रा ©️®️
                          कानपुर, उत्तर प्रदेश

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