नीतीश की टूटी जोड़ी नए चेहरों पर भाजपा ने खेला दांव 

 नीतीश की टूटी जोड़ी नए चेहरों पर भाजपा ने खेला दांव 



                       प्रोफे. डां. तेजसिंह किराड़ 


                (वरिष्ठ पत्रकार व राजनीति विश्लेषक)


तमाम अटकलों और गायें बगाऐं आखिर सुशील मोदी को बिहार की राजनीति से दूर रखकर भाजपा के शीर्ष नेताओं ने एक नया राजनीतिक दांव खेला हैं। राज्य में एक जगह अब दो-दो डिप्टी सीएम बनाएं गये हैं। वेणु देवी और तारकिशोर प्रसाद। अब सुशील मोदी केन्द्र में जाएगें या किसी राज्य के राज्यपाल बनाएं जाएगें ? अब नई अटकलों का बाजार गर्म हो चुका हैं। भाजपा बिहार में आगामी चुनाव अपनी पार्टी से ही सीएम तैयार करना चाहेगी। क्योंकि 7बार सीएम रह चुकें नीतीश के सामने बढ़ती उम्र का फेक्टर और इस बार ये अंतिम बार कहने से उनकी जेडीयू का भविष्य भी खतरें में देखा जा रहा हैं। भाजपा इसी बलबूतें पर बिहार में हर सीटों पर कमल खिलानें की रणनीति बना चुकी हैं। नीतीश भी भाजपा की इस रणनीति से बखुबी वाकिफ हो चुके हैं।


केन्द्र और राज्य की राजनीति में सत्ता,अनुभव और उम्र ये राजनीति करने वालों के लिए एक खुली किताब के रूप में होते हैं। अपने स्वार्थ के लिए राजनीति में सब कुछ जायज हैं। मप्र,महाराष्ट्र, हरियाणा आदि ऐसे कई राज्य हैं जहां पार्टियों में समझौतें का मकसद केवल पार्टी को जिंदा रखना माना जाता हैं। इसके लिए गढ़जोड़ या जोड़तोड़ को भी एक संवैधानिक मान्यता के रूप में परिभाषित करने से भी परहेज नहीं किया जाने लगा हैं। बिहार में नीतीश के नाम पर चुनाव लड़ा गया किन्तु जेयूडी तीसरे नम्बर की पार्टी रहकर भी राज्य में सत्ता की चाबी अपने पास रखें हुए हैं। इससे भविष्य में कई राज्यों में एक नवीन राजनीति का जन्म होगा। दो -दो डिप्टी सीएम का उप्र का फार्मूला प्रयोग अब भाजपा ने बिहार में किया हैं। अब जल्दी ही मप्र में भी सिंधिया गुट से तुलसी सिलावट और अमित शाह गुट से नरोत्तम मिश्रा भी अपनी दावेदारी ठोकने वाले हैं। वहीं भाजपा जैसी बड़ी पार्टियों को सत्ताई मजबूरी में छोटी पार्टियों को सत्ता देना एक सबसे बड़ी कमजोरी बनने लगेगी । फलत: इससे नये जनप्रतिनिधियों के बीच एक आंदरूनी आक्रोश पैदा होगा और नये राजनीति के समीकरणों को बढ़ावा मिलने लगेगा। नीतीश बड़े भाग्यशाली हैं जो अपनी आखरी सातवीं पारी भी सीएम के रूप में खेलेगें। उनकी हर पारी में जोड़ीदार रहें सुशील मोदी को सीएम बनने का लाभ कभी नहीं मिला । इस बार तो सुशील मोदी को ही राज्य की राजनीति से दरकिनार कर बिल्कुल दो नये चेहरों को डिप्टी सीएम बनाने कि कयावद भी आरंभ हो गई और उन्हें बना भी दिया गया हैं। सुशील मोदी सीएम बनने के ख्वाब के कारण बिहार तक के ही नेता बनकर रह गये। आज उन्हें अनुभव हुआ हैं कि राजनीति में सीधे,सरल स्वभाव काम में नहीं आते हैं। वे ना तो सीएम बन सके और ना ही केन्द्र की राजनीति के लिए कोई उभरकर एक बड़े नेता बन सकें। वेणु देवी और तारकिशोर प्रसाद को भाजपा ने महत्व देकर सुशील मोदी को एक तरह से करारा झटका दे दिया हैं। नीतीश की शपथ के बाद भविष्य में सुशील की नाराजी राज्य में कुछ नये गुल खिला सकती हैं। तेजस्वी यादव की निगाह भी सुशील मोदी पर टिकी हुई हैं। भाजपा ने बिहार में नये चेहरों को डिप्टी सीएम बनाने का मानस किसी दबाव में नहीं वरन भविष्य में राज्य में अपने दम पर कमल खिलानें के उद्देश्य से लिया हैं। बिहार में भाजपा में दो गुट बन चुकें हैं। एक गुट सुशील मोदी को डिप्टी सीएम के रूप में देखना चाहता हैं और एक गुट किसी नये चेहरें को डिप्टी सीएम बनाने की कयावद में सक्रिय हो चुका हैं। केन्द्र में भाजपा के शीर्ष नेताओं के गले के नीचे सुशील मोदी की नाराजी उतर नहीं पा रही हैं। किसी बड़े तूफान की आशंका और राजनीति भूचाल से हर कोई आशंका जता रहा हैं। सुशील मोदी बिहार के कारण कभी भी एक स्थापित राष्ट्रीय नेता नहीं बन सकें। आज जब बिहार में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में भाजपा उभर कर आई तो सीएम बनने का सपना भी सुशील मोदी के हाथ से राजनैतिक मजबूरियों के चलते नीतीश कुमार ने छिन लिया। राजनैतिक के इतिहास में इससे बड़ा दुर्भाग्य देवेन्द्र फडणवीस के बाद सुशील मोदी के नाम दर्ज हो गया हैं। महाराष्ट्र की तुलना में बिहार के हालात एकदम विपरीत हैं। महाराष्ट्र में सत्ता के लिए पच्चीस वर्ष पुरानी दोस्ती तो टूटी ही भाजपा की सत्ता भी हाथ से चली गई। परन्तु बिहार में सुशील को एकाएक दरकिनार करने के पीछे भाजपा संगठन की आंदरूनी राजनीति के दांवपेंच को ही समझा जा रहा हैं। आरजेडी ने जेयूडी के कई विधायकों को बड़े आफर दिए किन्तु नीतीश की दहशत के चलते वे टूट नहीं सकें और लालू के लाल किसी नए दांव की तैयारी में जुट चुकें हैं क्योंकि बराबर के 19-20 आंकडों के कारण आरजेडी मप्र के राजनैतिक पैटर्न को भी अपनाने से पीछे नहीं हटने वाली हैं। इसके लिए नीतीश के वर्तमान घटनक्रम पर पूरी बारिकी से नजर जमाएं रखना होगी। केन्द्र और राज्य की भाजपा को पता हैं कि नीतीश के जेयूडी को सीएम पद से दूर रखने का मतलब बिहार को अपने हाथ से खोना ही साबित हो सकता हैं। तेजस्वी यादव यदि बिहार में मप्र के सिंधिया पैटर्न की गंभीर रिसर्च करें तो संभव हैं कि आरजेडी बिहार में भविष्य में सत्ता पर काबिज हो सकती हैं। मप्र में जो काम भाजपा ने किया वहीं गणितीय जोड़तोड़ यदि बिहार में आरजेडी कर लेती हैं तो भाजपा को भी एक नसीहत का एहसास जरूर हो सकता हैं। कहते हैं कि इंतजार के परिणाम बहुत बेहत्तर प्राप्त होते हैं।महान चाणक्य ने कहा कि राजनीति में दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बना लीजिए बाकि के सब कठिन से कठिन काम आसान हो जाते हैं। तेजस्वी यादव इस रणनीति में माहिर हैं। चिराग पासवान पर एक्सन उठाने के ठोस संकेत नीतीश कुमार पहले ही दे चुके हैं। अब तो जेडीयू के अशोक चौधरी और विजेन्द्र यादव ने चिराग पासवान को एनडीए से हटानें कि मांग की हैं। ऐसे में चिराग का भविष्य आरजेडी के साथ हाथ मिलाकर चलने में राज्य में कुछ भी कयामत ला सकते हैं। किन्तु भाजपा भी हर हलचल पर गंभीरता से नजर रखें हुए हैं। सुशील मोदी को जितनी जल्दी हो सके भाजपा ने केन्द्र में या अन्य राज्य में राज्यपाल बनाए जाने के लिए जल्दी ही कदम उठाने पड़ेगें। एक राजनीति विश्लेषक के नाते एक संभावना यह भी बन सकती हैं कि सुशील मोदी को एक सम्मान जनक पद उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार बनाने के रूप में भी बिहार से भाजपा भविष्य में सरतूरुप के रूप में उपयोग कर सकती हैं ताकि आगामी राज्य के चुनाव में भाजपा अकेले अपने दमपर बिहार की जनता को एक बड़ा गिफ्ट और सम्मान देकर भाजपा सुशील मोदी की आज की नाराजी को दूर कर सकती हैं। आज के शपथ समारोह में साफ देखा गया कि पर एक नई राजनीति और कूटनीति के रूप में नई जमीन तैयार करने की रणनीति बनाने जा रही हैं। आगे चलकर नीतीश के राजनीति संयास के बाद जेयूडी में हालफिलाल कोई दमदार चेहरा नहीं हैं। इसी का फायदा भाजपा नीतीश को सीएम बनाकर कई तीर एक साथ चलाना चाहेगी। शपथ में अमित शाह और नड्डा ने भी नये चेहरों का मूल्यांकन करने के साथ ही सुशील मोदी के दर्द को भी कम करना इनका मकसद था। दो डिप्टी सीएम के साथ नीतीश की राजनीतिक यात्रा बिहार में आगे कितना संतुलन बना पाएगी यह तो वक्त ही बताएगा कि भाजपा और जेयूडी के कितने नाराज लोग आरजेडी के साथ हाथ मिलाने की सोच सकते हैं। वहीं तेजस्वी यादव की आरजेडी ने शपथ ग्रहण कार्यक्रम में शामील ना होकर कई संकेत दे दिए हैं। जिनका अर्थ आने वाले समय में साफ नजर आने वाला हैं।


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