नीतीश को ना मिली चाबी तो आरजेडी का थाम सकतें हैं हाथ 

नीतीश को ना मिली चाबी तो आरजेडी का थाम सकतें हैं हाथ 



                 प्रोफे. डां. तेजसिंह किराड़ 


          (वरिष्ठ पत्रकार व राजनीति विश्लेषक)


आखिर तमाम एग्जिट पोलो के खोखलें दावों का सर्वे बिहार में चारों खानें चित्त हो गया हैं। विगत एक सप्ताह से हर चैनलों ने तेजस्वी यादव के सीएम बनने के दावें करके भाजपा और आरजेडी की नींद उड़ा दी थी। किन्तु अमेरिका के जो बाईडेन की तरह नीतीश को भी बिहार में एक बार फिर से सत्ताई संजीवनी मिल गयी हैं। भाजना ने सबसे बड़ी बड़ी पार्टी के रूप में जीत दर्ज करके बिहार के तमाम राजनैतिक समाकरणों को बदल दिया हैं। सत्ता की चाबी नीतीश के हाथ लगती हैं या भाजपा अपने स्वभाव के मुताबिक दावं खेलकर सुशील मोदी को सीएम बनाती हैं। यह बड़ा दिलचस्प माजरा भी सामने आ सकता हैं। 


भाजपा के स्टार प्रचारकों और बिहार के भाजपाई वोट बैंक ने नीतीश की राजनीति को एक बार फिर से संजीवनी प्रदान कर दी हैं। अकेले नीतीश कुमार की जेडीयू भी बिहार में तीसरें नम्बर पर खिसक गयी हैं। आजेडी राज्य में सबसे बड़ी दूसरी पार्टी बनकर उभर चुकी हैं।चुनाव में सबसे बड़ा करिश्मा भाजपा ने कर दिखाया हैं। नीतीश के आगे हर बार घुटने टेकने वाली भाजपा ने इस बार अपना सिक्का जमाकर भाजपाई लोहा मनवा दिया हैं। मोदी की लहर से एक बार फिर बिहार के मतदाताओं ने राष्ट्रीय महत्व के ज्वलंत समसामयिक मुद्दों को ना केवल सुना और समझा हैं वरन राष्ट्र हित के तहत को देखते हुए मोदी को बिहार में सबसे ज्यादा पसंद भी किया गया हैं। बिहार में जब हर सीटों से सर्वे के एग्जिट पोल में मतदाताओं ने तेजस्वी यादव को एक गंभीर और युवा नेताबनाकर खुब ढोल पीटा तो देश के चुनाव विश्लेषकों को यह सब एक अप्रत्याशित ही महसूस हुआ। परन्तु एक मात्र दैनिक भास्कर के सर्वेक्षण ने एनडीए की ही सरकार बनने की घोषणा की थी जो आखिर में सच भी साबीत हुई हैं। भाजपा को सबसे ज्यादा 74 सींटे मिली हैं और नीतीश की जेडीयू को केवल 43 सीटों से ही संतोष करना पड़ा हैं वहीं आरजेडी ने बड़ी छलांग लगाकर 68 सीटें हासील करके नीतीश के प्रभाव और जनता विश्वास को सरासर तोड़ दिया हैं। कांग्रेस को बिहार में सबसे बड़ा झटका लगा हैं। कांग्रेस ने आरजेडी के भरोसे ही गठबंधन करके यह चुनाव लड़ा हैं। ऐसे में सोनिया सेना के प्रचारक तंत्र को बिहार में बिल्कुल नकार दिया गया हैं।यह कांग्रेस की स्वयं की बिहार में सबसे बड़ी हार हैं। आरजेडी ने नीतीश काका को ना केवल सीटों के मामले में हराया हैं वरन भाजपा के बढ़ते जनाधार से जेडीयू का वर्चस्व भी बिहार में अब धीरे -धीरे खत्म होकर भाजपा के पाले में कई नेताओं का समर्पण होना अब सुनिश्चित ही हैं। क्योंकि जेडीयू के नेताओं को भाजपा के बड़े बैनर के नीचे उनकी राजनीति जमीन सुरक्षित नजर आ रही हैं। चिराग पासवान ने जेडीयू के सारे समीकरण गड़बड़ा दिए हैं। ऐसे में जेडीयू के कई हारे हुए और भाजपा में मोदी पर भरोसा करने वाले दिग्गज नेताओं का निकट भविष्य में टूट कर जाना अवश्यंभावी हैं। महाराष्ट्र में भाजपा बड़ी पार्टी बनीं और शिवसेना गठबंधन में दूसरे नम्बर की। तब भाजपा ने सीएम भाजपा का बनाना चाहा तो शिवसेना ने भाजपा से हाथ खींचकर कांग्रेस और राकांपा से हाथ मिलाकर राज्य में सरकार बना ली थी। ऐसा ही आंदरूनी डर कुछ भाजपा को भी खाऐं जा रहा हैं। क्योंकि यदि नीतीश को सीएम नहीं बनाया गया तो नीतीश सीधे सीधे अपने दोस्त और दांत रोटी खाने वाले लालू यादव से भी हाथ मिला सकते हैं। ऐसे में भाजपा कोई भी ऐसा कदम उठाने के पहले महाराष्ट्र के समीकरण को रातदिन तोते की तरह रट कर ही कोई ठोस कदम उठाने का सोच सकती हैं। क्योंकि नीतीश सत्ता ना मिलने की दशा में नवीन गठबंधन के लिए कुछ भी कर सकते हैं। समय आने पर भाजपा का पाला भी बदल सकते हैं। चुनाव परिणाम के आते ही भाजपा के शीर्ष क्रम के नेताओं ने नीतीश को बधाई देने के हर तरफ से पूल बांध दिए हैं। उधर तेजस्वी यादव अपने नीतीश काका को तोड़ने की हर संभव कोशिश भी कर सकते हैं। भले ही नीतीश कुमार ने चुनाव प्रचार में लालू यादव के परिवार की पारिवारिक बातों को मंच सभाओं में लगातार हर जगह क्यों ना बोला हो। आखिर नीतीश कुमार हैं तो आरजेडी के ही अंग। एक समय नीतीश और लालू यादव के अतिरिक्त बिहार में कोई तीसरा नाम कभी नहीं उभर सका हैं। भाजपा को पता था कि तेजस्वी यादव की लड़ाई सीधे सीधे नीतीश की जेडीयू से हैं ना कि भाजपा और नरेन्द्र मोदीजी से हैं। तेजस्वी कई बार चुनाव में बोल चुकें थे कि केन्द्र में मोदीजी के अतिरिक्त कोई दूसरा व्यक्ति दूर-दूर तक नहीं हैं।। और राज्य में आरजेडी के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं हैं। ऐसे में मतदाताओं की स्थिति लगभग दिकभ्रमित हो चुकी कि तेजस्वी यादव मोदीजी के परम अंधें भक्त हैं । इस परिणाम यह रहा कि मतदाताओं ने भाजपा को एक सबसे बड़ा विकल्प चुनने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाजपा ने बिहार में बहुत बड़ा जनाधार तैयार कर लिया हैं। आगामी चुनाव में अब सहयोगी गठबंधन में नीतीश का दबाव उतना काम नहीं करेगा जितना इस बार के चुनाव में नीतीश कुमार ने भाजपा पर बहुत बड़ा दबाव बनाकर अपना पलड़ा भारी रखने की कोशिश की थी। लेखन ने अपने पूर्ववर्ती लेख में पहले ही स्पष्ट लिखा था कि बिहार में भाजपा नीतीश कुमार की कार्यशैली को लेकर बहुत ही नाराज बनी हुई हैं। ऐसे में चिराग का बड़बोलापन काफी हद तक जेडीयू के लिए बहुत बड़ा घातक सिध्द हुआ हैं। नीतीश चुनावी रणनीति में बहुत माहीर हैं। परन्तु वे भाजपा के आंदरूनी पैतरें का सही मूल्यांकन में मार खा गये हैं। यदि भाजपा अपनै वाले के मुताबिक नीतीश कुमार को सीएम ना बनाकर सुशील मोदी को सीएम पद देने का दांव चलती हैं तो बिहार में मप्र जैसे हालात हरहाल में बनते देर नहीं लगेगी। और कई जेडीयू के विधायक टूटकर आरजेडी के पाले में जा सकते हैं। ऐसे में भाजपा को महाराष्ट्र जैसी स्थिति से गुजरना भी पड़ सकता हैं। महाराष्ट्र में भाजपा गठबंधन वाली बड़ी पार्टी जरूर बनीं किन्तु सत्ता की चाबी लेने की नोंकझोंक में भाजपा को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था।भाजपा बिहार में ऐसी गलती कभी नहीं करना चाहेगी। इस राजनीति मूल्यांकन के आधार पर नीतीश को जेडीयू की कम सीटें रहने पर भी सीएम पद जरूर मिल सकता हैं। भाजपा के लिए बिहार का गढ़ जीतना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ना कि सीएम का पद भाजपा को दिलाना । तेजस्वी यादव भी चुप बैठने वाले नेताओं में से नहीं हैं। चाहे वे सत्ता से बाहर हो गये हो किन्तु है तो वे लालू के लाल। हर हाल में कुछ ना कुछ तिकड़म जरूर सत्ता के लिए वे अपना सकते हैं। आखिर राजनीति में उनके दो विरासती गुरू उन्हें मिले हुए हैं एक उनके पिता स्वयं लालू यादव और दूसरे उनके घोर विरोधी रहें स्वयं नीतीश कुमार भी उनके बचपन को और राजनीति को तरासते रहें हैं। सत्ता पाने की चाहत में कुछ भी करना और सत्ता ना रहने पर कुछ भी नये समीकरण बना लेने का राजनीति खेल सदियों पुराना रहा हैं।


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