सालों का रिश्ता निभाने मालाणी क्षेत्र में पहुंचते हैं हजारों मेहमान पक्षी कुरजां

सालों का रिश्ता निभाने मालाणी क्षेत्र में पहुंचते हैं हजारों मेहमान पक्षी कुरजां



बालोतरा,(कैलाश गोस्वामी) सर्दी के मौसम शुरू होते ही मालाणी की मरुभूमि प्रवासी पक्षियों को खूब रास आ रही है। हजारों किमी का सफर तय करके विदेशी पक्षी यहां अठखेलिया करने पहुंच रहे हैं। इन दिनों तिलवाड़ा क्षेत्र के मालाजाल के रूप सरोवर जल स्रोतों (तालाब) पर कुरजा पक्षियों का जमावड़ा लगा हुआ है। कुरजां पक्षियों के इस जमीन से रिश्ते इतने गहरे हो गए है कि अब इनकी तादाद यहां हर वर्ष की भांति और बढऩे लगी है। वहीं दूसरी और कुरजां पक्षियों के साथ कई अन्य प्रवासी पक्षी भी यहां आने लगे है। दरअसल वैसे रेगिस्तान के तपते धोंरों पर तो विदेशी क्या देशी अनुकूलित पक्षियों के भी हाल-बेहाल हो जाते हैं। लेकिन इस धरती ने मेहमान पक्षियों को इस कदर 


अपनी और आकर्षित किया है कि ये पक्षी सालों से अपने शीतकालीन प्रवास पर यहां पहुंचते हैं। ओर सर्दी के शुरू होने के साथ ही अब मालाजाल क्षेत्र में कुरजां हजारों की संख्या में पहुंच चुकी हैं। मालाजाल क्षेत्र में प्रतिवर्ष शीतकालीन प्रवास पर आने वाले मेहमान पक्षी कुरजां अक्टूबर माह में यहां पहुंचते है तथा फरवरी तक शीतकालीन प्रवास कर मार्च माह में अपने वतन वापसी की उड़ान भरते हैं। शीतकालीन प्रवास के दौरान कुरजां मालाणी क्षेत्र के मालाजाल में अपना डेरा लगाए बैठती है। पास ही लूनी नदी के मैदानों में रात्रि विश्राम कर सुबह मालाजाल में रूप सरोवर तालाब के किनारे चुग्गा करते हुए विचरण करती है। यह कुरजा पक्षी मुख्यतया मध्य एशिया, साइबेरिया, सेन्ट्रल यूरिशिया, मंगोलिया से यहां आते हैं। ये पक्षी बदले मौसम के साथ ही भ्रमण पर निकलते हैं। इनकी प्रमुख खूबी यह बताई जा रही है कि ये पक्षी बिना भोजन व बिना विश्राम किए उड़ान भरने की क्षमता रखते हैं। कुरजा जमीन से 20 हजार से 26 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरते हुए भारत मे हिमालय की ऊंची चोटीयों से गुजरती हुई यंहा मालाजाल पहुंचती है।


मालाजाल क्षेत्र की जमीन से गहरा रिश्ता बढ़ सकता पर्यटन-  


माता राणी भटियाणी मंदिर संस्थान अध्यक्ष रावल किशन सिंह जसोल ने बताया कि लगातार कई वर्षों से विदेशी पक्षी कुरजां के यहां आने के साथ ही उनका क्षेत्र के साथ गहरा रिश्ता हो गया है। कुरजां के मूल स्थानों पर बर्फबारी के कारण उनके लिए भोजन की विकट परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। तथा ये पक्षी भोजन के लिए सुरक्षित स्थानों की तरफ उड़ान भर लेते हैं। कुरजां संभवतया शुरूआती दौर में अपने मूल स्थानों के आस-पास के क्षेत्रों में ही प्रवास करती थी। लेकिन वहां पक्षियों पर किसी खतरे की आहट से धीरे-धीरे शीतकालीन प्रवास स्थलों की दूरी बढ़ती गई। और कुरजां अब करीब 8000 किमी का सफर तय कर यहां आ रही है। कुरजां यहां पंहुच कर खुद को महफूज महसूस कर रही है। ओर हरवर्ष यंहा आने से उनके लिए चुग्गा भोजन की सुगम व्यवस्था मंदिर ट्रस्ट की ओर से की जाती है। इस कारण यह धरती उनको रास आ गई है। जिसके चलते यंहा बड़ी संख्या में पक्षी पहुंच रहे है। मालजाल में हजारों की तादाद में कुरजां का स्वच्छंद विचरण यहां आने वाले देशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। यहां कुरजां को देखने के लिए प्रतिवर्ष सैकड़ों सैलानी पंहुचते है ।और कुरजां की मनमोहक अठखेलियां देखकर अभिभूत हो उठते हैं। मंदिर संस्थान द्वारा भी इनके लिए पानी व प्रतिदिन 4 क्विंटल चुग्गा की व्यवस्था की जाती है। साथ ही सरकार को भी पर्यटन विकास को देखते हुए कदम उठाने चाहिए। जिससे क्षेत्र में पर्यटन की संभावनाएं बढ़ने के साथ प्रबल हो सके। बड़ी संख्या में पहुंचने वाले विदेशी पक्षियों के पेयजल को लेकर भी सरकार को विशेष ध्यान देना चाहिए । मंदिर ट्रस्ट की ओर से प्रतिवर्ष तालाब की खुदाई का कार्य भी किया जाता है। जिससे पेयजल की व्यवस्था सुगम हो सके। साथ ही पहुंचने वाले विदेशी मेहमानों पक्षियों के साथ स्थानीय पशु पक्षियों के साथ पर्यावरण संरक्षण भी हो सके ।


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