शिक्षा को लेकर लड़कियों की एक अभिनव पहल

शिक्षा को लेकर लड़कियों की एक अभिनव पहल

जयपुर: राजस्थान में 1000 से अधिक लड़कियों ने राज्य में सभी के लिये शिक्षा और छात्रवृत्ति लाभ पहुंचाने की मांग को लेकर एक नये तरह के आंदोलन की शुरूआत की है, जिसमें लड़कियां गांव-गांव जाकर दीवारों पर जागरूकता संबंधी नारे लिख रही है, रैलियां आयोजित कर रही है और सरपंच से मिलकर शिक्षा और छात्रवृत्ति के अधिकारों की मांग कर रही है।


10 लड़कियों की पहल के रूप में शुरू हुआ यह अभियान जिसे राजस्थान में ‘दलित, आदिवासी, पिछली वर्ग बालिका शिक्षा अभियान’ के नाम से जाना गया, में अब तक 1000 से अधिक लड़कियां जुड़ चुकी है। इन  लड़कियों का यह कहना है कि वे अपना अभियान तब तक जारी रखेगी, जब तक उनकी मांगे पूरी नहीं हो जाती। 

उनकी मांगों में इस संबंध में पर्याप्त फंड की सुनिश्चिता, प्रभावी क्रियान्वयन और एससी, एसटी और ओबीसी के लिये चलायी जा रही सरकारी छात्रवृत्ति योजनाआंे के लाभ का समय पर वितरण सम्मिलित है। इसके अलावा वे सरकारी स्कूलों में माध्यमिक शिक्षा प्राप्त कर रही सभी लड़कियों के लिये स्कूल विकास शुल्क, परिक्षा शुल्क में छुट तथा मुफ्त यूनिफाॅर्म और पुस्तकों की मांग कर रही है।


यह आंदोलन परिवारों और लड़कियों के लिए महामारी के बीच बढ़ती आर्थिक कठिनाइयों के दौर में सामने आया है। जब से स्कूलों को बंद किया गया है, युवा लड़कियों को अवसाद और, मानसिक स्वास्थ्य संबंधित मुद्दों का सामना करना पड़ रहा है। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) के एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि राजस्थान में सर्वेक्षण किए गए प्रत्येक 10 किशोरों में से 2 लॉकडाउन के कारण उदास महसूस करते हैं। ये लड़कियां राजस्थान में शैक्षिक और सामाजिक विकास के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन यानि बदलाव के उद्देश्य से काम कर रही हैं।
इसके अलावा, उनकी अन्य मांगों में अलग-थलग पड़े समुदायों की लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए मुफ्त साईकिल और ट्रांसपोर्ट वाउचर स्कीम का प्रभावी क्रियान्वयन सम्मिलित है।
राजस्थान इसकी समृद्ध विरासत और प्रगति के लिये जाना जाता है लेकिन लैंगिक भेदभाव और असमानता के कारण महिलाओं और लड़कियों का सीमित विकास ही हो पाया है जिसके फलस्वरूप उनके सशक्तिकरण में अवरोध उत्पन्न हुआ है और अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी सीमित रह गयी है।


शिक्षा की पहुंच का स्तर विभिन्न सामाजिक समुहों में अनुसुचित जातियों और अनुसुचित जनजातियों जैसे वंचित समुहों में काफी कम है वहीं लैंगिक असमानता के कारण इन समुदायों की लड़कियों को दोहरा नुकसान हो रहा है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के 2018 के अध्ययन के आंकड़ो से स्पष्ट है कि एससी और एसटी समुदाय की लड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर बहुत ऊंची है। जहां सभी समुदायों में लड़कियों की यह दर 16.9 फीसदी है वहीं एसटी समुदाय की 24.4 फीसदी और एससी समुदाय की लड़कियों में यह दर 19.1 फीसदी है।

इस संबंध में दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग की लड़कियों के लिये राजस्थान में शिक्षा आंदोलन की समन्वयक प्रियंका बैरवा के अनुसार, ‘‘इस साल कई लड़कियों ने स्कूल में एडमिशन लिया है, लेकिन इस महामारी के चलते उत्पन्न हुए आर्थिक संकट के कारण हमें डर है कि जब स्कूल फिर से खुलेंगें तब लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर फिर से बढ़ जायेगी। हम एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिये सरकारी छात्रवृत्तियों के लिये पर्याप्त फंड प्रोविजनिंग, कुशल कार्यान्वयन और समय पर इसके वितरण की मांग कर रहे है ताकी अधिक से अधिक लड़कियां अपनी शिक्षा जारी रख सकें।’’

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