'चाणक्य' की चाल काम नहीं आयी

 विधानसभा चुनाव नतीजों के

 क्या हैं राजनीतिक मायने 

'चाणक्य' की चाल काम नहीं आयी

विधान सभा चुनाव के नतीजों के क्या हैं राजनीतिक संदेश

पश्चिम बंगाल में चुनावी झटके के बाद इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले देश के गृह मंत्री अमित शाह मातम मना रहे होंगे या असम में दोबारा सत्ता में लौटने के आसार पर इत्मीनान की साँस ले रहे होंगे?

ममता बनर्जी के ख़ेमें में जीत का जश्न मनना शुरू हो गया है. केरल में एलडीएफ़ और तमिलनाडु में डीएमके गठबंधन के कार्यकायर्ता भी जश्न की तयारी में जुटे हैं। 

बीजेपी ने जिस तरह से बंगाल में चुनावी प्रचार किया था और अपने समर्थकों के बीच ये उम्मीद जगा दी थी कि विजय उसी की होगी, उस परिपेक्ष्य में देखें तो पार्टी के बड़े नेताओं के घरों में मायूसी छाई होगी। 

लेकिन इस दृष्टिकोण से देखें कि 2016 के विधानसभा चुनाव में केवल तीन सीटों पर जीत के बाद इस बार इतनी भारी संख्या में सीटों में बढ़त पार्टी के लिए एक गर्व की बात होगी। 

ऐसा लगता है कि अब पार्टी के हारे नेता इसी पहलू पर ज़ोर देंगें. चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनावों के नतीजों के पुख़्ता रुझान से कुछ बातें साफ़ होती दिखाई देती हैं। 

बंगाल के नतीजों से मुख्यमंत्री की 'फ़ाइटर' की छवि और ही पुख़्ता होती है. उनके सामने सियासी करियर की सबसे बड़ी चुनौती थी जिसमें वो खरी उतरीं। 

उनके कुछ साथी उन्हें छोड़कर बीजेपी में शामिल ज़रूर हो गए लेकिन उनके वोटरों ने उनका साथ नहीं छोड़ा. उनकी तृणमूल पार्टी को 2011 और 2016 के विधानसभा चुनावों में 44 प्रतिशत वोट मिले थे। 

यहाँ तक कि जब 2019 के आम चुनाव में उन्हें बीजेपी से झटका मिला और लोकसभा में उनकी सीटें कम हुईं तो उस चुनाव में भी पार्टी का वोट पर्सेंटेज नहीं गिरा। 

इस चुनाव के अब तक के रुझान से साफ़ हो गया है कि उनके समर्थकों और वोटरों ने उन पर अपना विश्वास बनाये रखा है। 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मायावती और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत कई लोगों ने उन्हें बधाई के सन्देश भेजे हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी ने अनगिनत रैलियों में ममता बनर्जी पर ताने कसे. मोदी ने 'दीदी ओ दीदी...कितना भरोसा किया था बंगाल के लोगों ने आप पर', जैसे जुमले मज़े लेकर कहे। 

शायद वोटरों ने इसे पसंद नहीं किया. इस पर पार्टी की सांसद महुआ मोइत्रा ने प्रधानमंत्री पर महिलाओं का अपमान करने का इलज़ाम लगाया था। 

दूसरी तरफ़ नंदीग्राम में एक छोटी सी घटना के दौरान ममता बनर्जी के पैर में चोट आयी जिसके बाद उन्होंने अपने पैर पर कई दिनों तक प्लास्टर चढ़ाए रखा और चुनाव प्रचार व्हीलचेयर पर किया। 

बीजेपी ने इसे 'ममता का ढोंग' कहा और इसे जनता से सहानुभूति हासिल करने का एक घटिया तरीक़ा कहा. उस समय बंगाल के एक राजनीतिक विशेषज्ञ रंजन मुखोपाध्याय ने बीबीसी से कहा था, "दीदी चुनाव जीत गयी. ये इमेज उन्हें पक्का चुनाव जिताएगी."

'चाणक्य' की चाल काम नहीं आयी

अमित शाह


अमित शाह ने चुनावी रैलियों में डंके की चोट पर दावा किया था कि उनकी पार्टी का 200 सीटों का लक्ष्य पूरा हो जाएगा. उनके समर्थक टीवी चैनलों ने इस पर सवाल उठाने के बजाय ये दिखाने की कोशिश की कि किस तरह से पार्टी इस लक्ष्य को हासिल करेगी। 

लेकिन अब चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह का ये दावा केवल एक 'चुनावी जुमला' साबित होता दिखाई देता है। 

बीजेपी पश्चिम बंगाल को हर हाल में जीतना चाहती थी. पार्टी ने दिसंबर के महीने से ही अपने संसाधनों को चुनावी मुहिम में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। 

पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह के रोड शो शुरू हो गए थे. शुरू के दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का बंगाल का दौरा भी अहम माना जा रहा था। 

जैसे-जैसे चुनाव के दिन क़रीब आने लगे और आठ राउंड के चुनावों के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने दर्जनों रैलियां कीं. भीड़ से भरी इन रैलियों की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर साझा की गयीं। 

केन्द्र सरकार के मंत्रिमंडल का हर अहम मंत्री, हर सांसद बंगाल का चक्कर लगाने लगा. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी राज्य भर में कई सभाओं को सम्बोधित किया

तोड़-जोड़ की सियासत काम ना आयी

सुवेंदु अधिकारी

SANJAY DAS/BBC

शुवेंदु अधिकारी और कई दूसरे नेताओं का टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल होना बीजेपी की मुहिम के लिए काफ़ी अहम माना जा रहा था. लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि टीएमसी बिखरने के कगार पर है। 

महाराष्ट्र में पिछले विधानसभा से पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भी कई नेता बीजेपी में शामिल हो गए थे. उस समय भी यही कहा जा रहा था कि एनसीपी टूट जाएगी. लेकिन चुनावी नतीजों के बाद एनसीपी और भी मज़बूत पार्टी बन कर उभरी। 

इसी तरह बंगाल में भी ताज़ा चुनाव ने ये साबित कर दिया है कि तोड़-जोड़ की राजीनीति काम नहीं आयी। 

कोलकाता में राजनीतिक विश्लेषक अरुंधति बनर्जी के अनुसार टीएमसी से 'बग़ावत' करने वालों को कुछ ख़ास कामयाबी नहीं मिली। 

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण काम नहीं आया

अरुंधति बनर्जी का कहना था कि बंगाल में चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और असदउद्दीन ओवैसी के चुनावी मैदान में कूदने से ममता बनर्जी को नुक़सान नहीं हुआ। 

नंदीग्राम से ममता बनर्जी को चुनौती देने वाले उनके पूर्व पार्टी नेता शुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 'बेगम' कहकर उनको मुस्लिम समर्थक और केवल मुसलमानों की नेता कहने की कोशिश की. पाकिस्तान का भी नाम लिया। 

अरुंधति कहती हैं, "हम नंदीग्राम गए थे तो उस समय लगा था कि पूरा चुनावी क्षेत्र हिन्दू-मुस्लिम ख़ेमे में बंट गया है. समाज में विभाजन ज़रूर हुआ, विशेषकर नंदीग्राम और इसके आसपास के इलाक़ों में. लेकिन राज्य के वोटरों ने हिन्दू-मुस्लिम नैरेटिव को नकार दिया."

कांग्रेस का पतन जारी
बंगाल में कांग्रेस पार्टी और वामपंथी मोर्चे ने मिलकर चुनाव लड़ा. लेकिन पिछले दो चुनाव की तुलना में कांग्रेस का और बुरा हाल हुआ। 

केरल में यूडीएफ़ का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस के लिए सत्ता में आना ज़रूरी समझा जा रहा था. चुनावी मुहिम के दौरान कांग्रेस के कुछ नेताओं ने बीबीसी से कहा था कि जीत उनकी पुख़्ता है क्योंकि सत्तारूढ़ एलडीएफ़ भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोपों में घिरा था। 

पिनराई विजयन

लेकिन उस समय कई विशेषज्ञों ने एलडीएफ़ की जीत की साफ़ भविष्यवाणी की थी और कहा था कि अगर कांग्रेस हारी तो राज्य में पार्टी के कई नेताओं का दूसरी पार्टियों में पलायन होगा. अब राज्य में कांग्रेस 10 साल तक सत्ता से बाहर रहने वाली है जिसके कारण पार्टी में बेचैनी और संतोष बढ़ेगा। 

कांग्रेस को हार इसलिए भी भारी पड़ेगी क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में गठंधन ने केरल की 20 सीटों में से 19 सीटें जीती थीं. पार्टी ने तमिलनाडु में डीएमके से गठबंधन करके उस राज्य में सत्ता में आने का रास्ता खोला ज़रूर है लेकिन केवल एक जूनियर पार्टनर की हैसियत से। 

पुडुचेरी में भी पार्टी को धक्का लगा और उसका सत्ता में लौटने का सपना अधूरा रह गया. असम में इसे एक बार फिर पाँच साल के लिए विपक्ष में बैठना पड़ेगा.

इस बार बंगाल और दूसरे राज्यों में विधानसभा का चुनाव कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के साये में हुआ है। 

कुछ विशेषज्ञों को लगा था कि चुनाव आयोग के बंगाल में आठ चरणों में चुनाव कराने के फ़ैसले का लाभ बीजेपी को होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। (bbc.com)

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