"जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो ॥

" ना तीर निकालो ना तलवार निकालो..

"जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो ॥

आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है। आज हिंदी पत्रकारिता को पूरे 194 साल हो गए हैं। 30 मई 1826 को पं. जुगल किशोर शुक्ल जी ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदंत मार्तण्ड’ का प्रकाशन आरम्भ किया था..तब से लेकर आजतक हिंदी पत्रकारिता देश में कई दौर देख चुकी हैं। आज़ादी के आंदोलन में हिंदी पत्रकारिता का बड़ा योगदान रहा है। अब दौर बदल गया है। मिशनरी भाव की जगह पत्रकारिता का स्वरुप व्यवसायिक हो चुका है। ईश्वर से ये ही प्रार्थना है कि वो देश को ऐसी एजेंडा पत्रकारिता से बचाएं। मीडिया हाउसेज के एजेंडे को जनता भी समझें। ऐसी थोपी हुई पत्रकारिता का विरोध करें। अधिकांश पत्रकार तो ईमानदारी से अपना धर्म निभाते हैं या निभाना चाहते हैं, लेकिन मीडिया संस्थान धंधेबाज होते जा रहे हैं। अब दुर्भाग्य से सम्पादक की योग्यता का पैमाना बदल चुका है। आजकल अखबार मालिक नेताओं के अनुरूप सम्पादक बैठाने लगे है। 

सरकार के मुखिया या उस हैवी वेट नेता की पसंद क्या है, उस पैमाने पर कौन खरा है, ये सब मालिक ध्यान रखते है। जो सम्पादक अपनी खबरों की बदौलत इस दौर में भी कुर्सी पर बैठे है, उन्हें रोज सरकार के कोपभजन का शिकार होना पड़ता है। जनता की हकीकत से रूबरू कराने वी खबर को लेकर सरकार की तरफ से अखबार  मालिक को डांट पड़ने पर उस सम्पादक को सवेरे सवेरे सफाई देनी पड़ती है। बेचारे सम्पादक को खामखां अपनी ईमानदारी की दुहाई देनी पड़ती है। मालिकों की बेरुखी और छंटनी के डर से इस राह पर चलने पर सम्पादक अक्सर तनाव में ही जीते है। उन्हें इस्तीफा जेब में साथ रखना पड़ता है। कुछ तो नौकरी जाने के तनाव के बीच परिवार पालने की जिम्मेदारी के बोझ से दबे थोड़े दिन बाद हांफने लग जाते है, जबकि कुछ बीपी, डायबिटीज,  हाइपर टेंसन, हार्ट जैसी बीमारियों के शिकार हो जाते है। सरकारों को राजी करने के लिए मालिकों की ओर से निकाल दिए गए कुछ क्रांतिकारी टाइप के सम्पादक यूट्यूब चैनल शुरू कर पत्रकारिता की लोह को बचाने की कोशिश में खुद को हवन करते हुए जिंदा होने का प्रमाण पेश करते नज़र आ रहे है। ऐसे सच्चे सम्पादकों को मेरा प्रणाम। बड़ा कठिन समय है। दूसरी तरफ पतलकार  सम्पादक लगातार बड़ा ओहदा और तन्खाह हासिल करते जा रहे है। वो देश के असली मुद्दे से ध्यान हटाकर उसे घुमाकर हिन्दू मुस्लिम,जैसे की बहस से जोड़- तोड़कर बहस कराते रहते है। ऐसे सम्पादकों के लिए वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग साहब अक्सर सोने के पीकदान शब्द का इस्तेमाल करते थे। इन दूसरी श्रेणी के पतलकार  सम्पादकों की संख्या आजकल बढ़ चुकी है। इन खोटे सिक्कों ने असली सिक्कों को चलन से बाहर कर दिया है। मेरा आधुनिक मीडिया संस्थानों से अनुरोध है कि अब समय आ गया है कि संपादक पोस्ट का नाम बदलकर प्रोडक्ट हेड कर देना चाहिए (शुरुआत तो बहुत पहले हो चुकी है)। जिससे एक गरिमा के साथ समय रहते  सम्पादक पोस्ट को ही श्रद्धाजंलि दी जा सके। 

 जनता भी दुर्भाग्य से आजकल मीडिया मालिकों की सोच के अनुरूप ही ऐसे सम्पादकों को पसंद करने लगी है, जो उसके चश्मे के अनुरूप खबरे परोसे, उसकी विचारधारा के अनुरूप दूसरी विचारधारा वाले को गालियां निकाले। जो ऐसा नहीं कर सकता वो नकारा है। असली अखबार और पत्रकारों का काम सरकारों को जनहित के अनुरूप जगाने का, उनकी नीतियों की समीक्षा करने, गलत करने पर खिंचाई करने का काम रहा है। आजकल धारा के विपरीत चलकर ईमानदारी से ऐसी पत्रकारिता करने वालों को सोश्यल मीडिया पर ठाली बैठी जनता ही भांड मीडिया, दलाल पत्रकार, वामपंथी पता नहीं क्या क्या उपाधियों से नवाजती रहती है। जबकि सरकार की गोद में बैठकर उनके यशोगान और कीर्ति की बखान करने वालों को अब विकासवादी पत्रकारिता कहा जाने लगा है। असल में तो इस कथित विकासवादी पत्रकारिता ने सरकार के जन सम्पर्क विभाग और उनके पीआरओ को ही बेरोजगार टाइप कर दिया है। इस दौर में जन सम्पर्क विभाग की जरूरत ही खत्म हो गयी है। ये काम अब मुख्य धारा का मीडिया बेहतरीन तरीके से करने लग गया है। 

अब सरकार के पक्ष का मीडिया और सरकार के विरोधी मीडिया, सिर्फ दो धाराएं ही रह गयी है। जनसरोकार की पत्रकारिता इतिहास होती जा रही है। 

  पत्रकारिता मेरी नज़र में आज भी पवित्र और ईश्वरीय कार्य है। ये साधू का ही काम है। जो सत्य की खोज और अन्वेषण कर संसार को वास्तविकता से अवगत कराने का महान दायित्व निभाने का है। सकारात्मक पक्ष ये है कि हिंदी पत्रकारिता में आज भी ऐसे अच्छे और सच्चे लोगों की कमी नहीं है। उन सभी साधू स्वभाव के पत्रकारों से मेरा अनुरोध है की वो सच्चाई लिखते रहे। अखबार में जगह नहीं मिले तो सोशयिल मीडिया पर ही लिखे। शब्द ब्रह्म होता है। लिखा हुआ कभी व्यर्थं नहीं जाता। आप देश हित में किसी भी प्लेटफॉर्म पर अपनी पत्रकारिता जारी रखे। ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो हम सब को अपना अपना दायित्व निभाने की ताकत दें। तभी लोकतंत्र फलता फूलता रहेगा। 

सत्य_मेव_जयते। 


                         (श्रवण_सिंह_राठौड़

(लेखक  प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। आपने लेखनी से अलग ही पहचान बनाई है।) 

                  

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