देश के जूनियर डॉक्टरों की भी इस समय अग्निपरीक्षा

देश के जूनियर डॉक्टरों की भी इस समय अग्निपरीक्षा


कोरोना काल में भारत के जूनियर डॉक्टरों की भी अग्निपरीक्षा-एलिस इवांस


डॉक्टर पंक्ति पंड्या की उम्र महज़ 22 साल है. उनकी डॉक्टरी की पढ़ाई इसी साल 26 फ़रवरी को ख़त्म हुई है। 

"हमें एक महीने में बहुत कुछ तेज़ी से सीखना पड़ा है... फ्रेशर्स और इंटर्न के तौर पर हमें संकट की स्थिति में झोंक दिया गया है."

ये अक्सर कहा जाता है कि नई नौकरी शुरू करने का सबसे अच्छी तरीक़ा ये होता है कि आप गहराई में उतर जाएँ। 

कोरोना संकट से जूझ रही भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में मेडिकल कॉलेजों से ताज़ा-ताज़ा निकले इन जूनियर डॉक्टरों के लिए ये डूबने और तैरने जैसा अनुभव है। 

डॉक्टर पंक्ति पंड्या की उम्र महज़ 22 साल है. उनकी डॉक्टरी की पढ़ाई का आख़िरी साल इसी 26 फ़रवरी को ख़त्म हुआ है। 

उन्होंने एमबीबीएस की तालीम अपने गृह राज्य गुजरात में ही ली है। 

जिस दिन उनका कोर्स पूरा हुआ, उस दिन गुजरात में कोरोना संक्रमण के 424 मामले रिपोर्ट हुए थे। 

22 मार्च तक रोज़ दर्ज होने वाला ये आंकड़ा बढ़कर 1580 हो गया था। इसी दिन आणंद ज़िले के श्री कृष्ण हॉस्पिटल में डॉक्टर पंक्ति ने अपनी इंटर्नशिप शुरू की थी। 

आधिकारिक रूप से डॉक्टर बनने के लिए इंटर्नशिप की प्रक्रिया से गुज़रना हर डॉक्टर के लिए ज़रूरी होता है। 

पंक्ति ने जैसे ही अपने काम का पहला महीना पूरा किया, गुजरात में रोज़ रिपोर्ट होने वाले संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 12500 से भी ज़्यादा हो गई। 

पंक्ति ने  बताया कि , "बहुत काम होता है और आप एक पल के लिए भी बैठ नहीं पाते हैं."

मेडिसिन के अलग-अलग क्षेत्र में काम या आगे की पढ़ाई के लिए मौके तलाशने के बजाय इस साल मेडिकल स्टूडेंट्स को कोविड ड्यूटी के फ्रंटलाइन पर तैनात कर दिया गया। 

पंक्ति और उनके जैसे लड़के-लड़कियों को कोविड वार्ड्स में शिफ्ट ड्यूटी दी जा रही है जहां वे सातों दिन 12 घंटे तक काम करते हैं। 

कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई
पंक्ति बताती हैं, "हमें कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ उतार दिया गया."

पंक्ति ऐसी ही एक शिफ्ट का ज़िक्र करते हुए बताती हैं कि उनके साथ दो और जूनियर डॉक्टर थे और 60 मरीज़ों के देखभाल की ज़िम्मेदारी उन पर थी। 

पंक्ति और उनके साथी ऐसे कोविड वार्ड में थे जिनमें ऐसे रोगी थे जिनकी स्थिति को मेडिकल साइंस की भाषा में 'स्थिर' कहा जाता है। 

इसका मतलब ये भी था कि वैसे वार्ड में कम डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जाती है। 

पंक्ति बताती हैं, "हम ये महसूस कर सकते थे कि काम करने वाले लोग कम हैं."

वो बताती हैं कि क्रिटिकल केयर यूनिट्स में जब बहुत सारे मरीज़ होते हैं और जब 'सबकी देखभाल कर पाने का कोई तरीका नहीं होता है' तो उन्हें 'बहुत डर' लगता है। 

पंक्ति कहती हैं कि लोगों को अपने सामने मरते हुए देखना, किस मरीज़ को कितनी तवज्जो देनी है, ये वो बातें हैं जो अमूमन डॉक्टरों को सीखने में सालों लगते हैं। 

लेकिन महामारी की चुनौती को देखते हुए जूनियर डॉक्टरों ने कम समय में काफी कुछ सीख लिया है। 

"मेरे कई दोस्तों को इंटर्नशिप की शुरुआत के समय ही ऐसे मामले देखने पड़े थे जहां मरीज़ की मौत हो गई. कुछ के साथ तो ऐसा ड्यूटी के पहले दिन या पहली रात को ही हो गया. जब आप ट्रेनिंग ले रहे होते हैं तो इन बातों का बहुत असर पड़ता है."

डॉक्टर सिमरन की कहानी

डॉक्टर सिमरन अग्रवाल ने पिछले साल मार्च में मुंबई के नायर हॉस्पिटल में अपना इंटर्नशिप किया था. वे 24 साल की हैं। 

डॉक्टर सिमरन की भावनाएं भी डॉक्टर पंक्ति से मिलती जुलती हैं। 

वो बताती हैं, "जब हम ख़ुद ही शारीरिक और मानसिक रूप से थके हुए होते हैं तो ऐसे में मरीज़ों की मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करना हमारे लिए मुश्किल हो जाता था."

सिमरन कहती हैं कि मरीज़ों और मेडिकल स्टाफ के बीच 'डर का माहौल' उनके इंटर्नशिप के दिनों में 'सबसे चुनौतीपूर्ण बात' थी। 

"मैंने ऐसे मरीज़ देखे जो अपने परिवारवालों से अलग रह रहे थे... वे रोते और हॉस्पिटल से भाग जाने की कोशिश करते."

"हमें ये मालूम होता है कि डॉक्टर बनना कोई फूलों की सेज पर सोना नहीं होता है... लेकिन ट्रेनिंग की शुरुआत में ही दिल दुखाने वाले माहौल से रूबरू होना उतना आसान भी नहीं होता है."

मेडिकल सप्लाई
कोविड वार्ड में ड्यूटी के बीच इंटर्न डॉक्टरों को ऐसी ज़िम्मेदारियां भी दी जाती हैं जो उतने पसंदीदा कामों में नहीं गिनी जाती हैं, जैसे हॉस्पिटल की मेडिकल सप्लाई पर नज़र रखना। 

लेकिन ये काम भी कम थकाऊ नहीं होते हैं। 

सिमरन बताती हैं कि उनके लिए सबसे मुश्किल रहा है कोविड हेल्पलाइन नंबर की ज़िम्मेदारी. इन हेल्पलाइन नंबर पर ऐसे लोग फोन करते हैं जिन्हें अस्पताल में बेड चाहिए होता है या फिर उन्हें ऐंबुलेंस की ज़रूरत होती है। 

दिसंबर और जनवरी में सिमरन को ये लगा कि वे बुरी तरह से थक गई हैं. शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप से, लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि काम से क़दम पीछे खींचने का उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है। 

वो बताती हैं, "मुझे लगता कि थोड़े समय के लिए ब्रेक मिल जाता लेकिन इसके लिए वक्त ही नहीं था."

मदद की ज़रूरत
उधर, आणंद में पंक्ति भी कोविड वार्ड की थका देने वाली ड्यूटी को ही अन्य कामों की तुलना में ज़्यादा तरजीह देती हैं। 

पंक्ति कहती हैं, "शायद ऐसा इसलिए है कि हम फ्रेशर्स हैं और हमने अभी-अभी काम शुरू किया है. हममें भीतर से इसके लिए उत्साह होता है."

"हम देखते हैं कि ये वो हालात हैं जिनमें लोगों को मदद की ज़रूरत होती है. हमें लगता है कि हम जितना कर सकते हैं, कर दें. इसलिए हम उनके बीच जाना चाहते हैं और मरीज़ों की देखभाल करना चाहते हैं."

"इस काम में बहुत उत्साह रहता है. सच कहें तो हम वापस लौटने का इंतज़ार ही नहीं कर सकते हैं."

DR KAMNA KAKKAR

डॉक्टर कामना कक्कर

महामारी की नई लहर
डॉक्टर पंक्ति और डॉक्टर सिमरन की तरह ही डॉक्टर कामना कक्कड़ भी अपने पेशे के सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देने की कोशिश कर रही हैंं। 

29 साल की कामना ने पिछली गर्मियों में एनिस्थीशिया में विशेषज्ञता की पढ़ाई पूरी की है। 


लेकिन रोहतक में गंभीर रूप से बीमार कोविड मरीज़ों की साल भर देखभाल के बाद वे अपने करियर की राह बदलकर आईसीयू पर फोकस करना चाहती हैं। 

वो बताती हैं, "भले ही वहां आपके आस-पास उदासी का माहौल हो, ग़मगीन कर देने वाला एहसास हो, मुझे लगता है कि अगर मैं एक या दो मरीज़ों को भी बचा पाती हूं तो बहुत संतोष मिलता है. शायद मेरी किस्मत में वहीं काम करना लिखा हो."

हालांकि डॉक्टर कामना ये स्वीकार करती हैं कि महामारी की नई लहर बर्बाद कर देने वाली है। 


उनके कई साथी डॉक्टर संक्रमित हो चुके हैं. ऐसे में कामना को डबल शिफ्ट करनी पड़ रही है. उनके वार्ड में डॉक्टरों की कमी है। 

हफ्ते भर पहले इमरजेंसी रूम में 'कोरोना मरीज़ों की भीड़' देखकर वे परेशान हो गई थीं. ये लोग आईसीयू बेड का इंतज़ार कर रहे थे। 

 डॉक्टर कामना ने बताया कि "मैं दिल से दुखी हो गई थी."

उसके बाद से कामना इस ख्याल से बचने की कोशिश कर रही हैं कि वहां 'लाशों का अंबार' लग जाएगा ताकि वो लोगों की जान बचाने पर ध्यान दे सकें। 

वो कहती हैं, "मैं उम्मीद करती हूं कि मैं ऐसी स्थिति में न पड़ूं जो अमानवीय हो. लेकिन हम ऐसी ही ज़िंदगी जी रहे हैं. मुझे लगता है कि मुझे आईसीयू में काम करने की चुनौतियों का अनुभव हो चुका है. उम्मीद है कि आने वाले समय में मैं इससे और बेहतर तरीके से निपट सकूंगी." (bbc.com)

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