अनाथ बच्चों पर सरकारों की चुप्पी और भविष्य से खिलवाड़

 अनाथ बच्चों पर सरकारों की चुप्पी और भविष्य से खिलवाड़ 


                         प्रोफे. डां. तेजसिंह किराड़ 

                 (वरिष्ठ पत्रकार व राजनीति विश्लेषक )

 कोरोना की भयावह त्रासदी के आज हम सब गवाह हैं। इस अप्रत्यक्ष अघोषित वायरस युध्द में  हर किसी ने कुछ ना कुछ जरूर  खोया हैं। परन्तु जिन्होंने अपने माथे के सांये और आंचन की छांव को खोया हैं उनके दर्द की दास्तान को केन्द्रीय सरकार और राज्यों की सरकारों से वस्तुस्थिति जानने का हर एक भारतीय को संवैधानिक अधिकार हैं। किन्तु इस देश में राजनीति करने की जो परिभाषा सदियों से चली आ रही हैं उससे आजतक सही मायनें में किसी करीब,जरूरतमंद,पीड़ित,शोषित और कमजोर तबकों के लोगों का समाधान आजादी के बाद से आज तक नहीं हो सका हैं। अपनी ढपली अपना राग के पदचिन्हों पर चलने वाली राज्य सरकारों को केवल और केवल वोट बैंक से ही वास्ता बना रहा हैं। सच्चाई तो यह हैं कि कोरोना से हताहत हुए हर राज्यों में हजारों परिवार आज ऐसे हैं जिन्होंने अपने माता-पिता को खोने के बाद उन्हें  कभी सुकून की नींद नसीब नहीं हो सकी हैं। " महान चाणक्य ने बहुत सही कहा हैं कि जब गरीब, कमजोर,असहाय और बेसहारा वर्ग की मौत होती हैं उसकी आवाज और जिंदगी की समस्याओं को राजनीति के खेल में दबा दिया जाता हैं और वहीं जब एक राजनेता की मौत होती हैं तो उसका पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीटा जाता हैं। " मौत के इस  दर्द की परिभाषा को आज सब नेताओं और सरकारों ने अपने अपने तरीके से परिभाषित कर रखा हैं। सूत्रों के अनुसार देश में  इस समय कोरोना के कारण कई लाख बच्चें अनाथ हो चुके हैं। इन बच्चों की ना तो स्थानीय राज्य सरकारें  कोई सूध ले पा रही हैं और ना ही विपक्ष में बैठे नेताओं को  इन अनाथ बच्चों के प्रति कोई हमदर्दी हैं और ना ही वे इन अनाथ बच्चों के लिए सड़कों पर उतर कर सरकारों से उनके उचित भरण पोषण और शिक्षण के संरक्षण की मांग कर रही हैं। इन लाखों अनाथ चेहरों पर जिंदगी जीने के लिए कोई मुकम्मल सरकारी उपाय योजना ना होने के कारण उनके चेहरों पर छाई मायूसी को साफ पढ़ा जा सकता हैं। हाल ही में राजस्थान के सीएम अशोक गेहलोत ने पीएम से ही उल्टा सवाल करके अनाथ बच्चों के लिए उपाय योजना की मांग कर दी। जबकि उनके ही राज्य के सैकड़ों अनाथ बच्चों तक ना कोई उनका नेता पहुंचा ना कोई सरकारी तंत्र का अधिकारी। उलटा चोर कोतवाल को डाटें वाली कहावत से यही स्पष्ट हो रहा कि देश में लगभग सभी राज्यों के यही हालात हैं। अनाथ बच्चों पर ओछी राजनीति करने वालों की खबरें भी चेनलों पर धडल्लें से प्रसारित की जा रही हैं किन्तु सच्चाई को छिपाकर अनाथ बच्चों के लिए कोई भी रहनुमा सामने आने से साफ कतरा रहें हैं। देश में कई राज्य, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तरीय सामाजिक संगठन किसी ना किसी रूप में एक जनकल्याणकारी परमार्थ में लगे हुए हैं किन्तु राज्य और केन्द्र की चुनी हुई सरकारों के पास इन अनाथ बच्चों को सामाजिक रूप से स्थापित करने के लिए कोई ठोस और कारगर रणनीति नहीं हैं। केन्द्र की और से घोषित आर्थिक मदद यदि इन्हें   18 या 20 बीस वर्ष के उपरांत मिलेगी  तो ये किसको पता कि इनमें से कितने बच्चें आर्थिक अभाव झेलते हुए सरकारी  लाभ के लिए जिंदा भी रह पाएगें या नहीं। या आज जो सरकार हैं वो अपने वादों के लिए  भविष्य में कितना अमल कर पाएगी ये तो किसी को पता नहीं हैं फिर लंबी अवधि के बाद के  लिए ये मदद क्यों ? क्योंकि एक सरकार के बदलते ही दूसरी सरकारें जिलों के नाम,शहरों के नाम और सरकारी योजनाओं के नाम बदलकर सबसे पहले पूर्व सरकार से बदला लेने की तैयारियों में ही जुटी रहती हैं। यह भारत की लोकतांत्रिक राजनीति हैं जो दुनिया में सबसे अलग और स्वार्थ को परिभाषित करने वाली राजनीति हैं। वरना भारत की राजनीति आज दुनिया में एक महाशक्ति के रुप में सिरमोर होकर शासन कर रही होती। इस देश के लोकतंत्र में ना तो विपक्ष अपने संवैधानिक अधिकारों का बखूबी निर्वाह करता हैं और ना ही सत्ता में बैठी सरकारें गरीबों,असहायों और जरूरतमंदों के उत्थान हेतू कोई ठोस योजनाओं पर अमल करवा पाती हैं। स्थानीय प्रशासन और बड़े नौकरशाहों के भरोसे चलने वाली सरकारों को लोकतंत्र में जनता कभी स्वीकार्य नहीं करती हैं। किसानों की मेहनत के अनाज को सरकारी गोदामों, खुली पड़ी मंडियों, दलालों और बिचौलियों के कारण करोडों टन अनाज को बारिश में सड़ने के लिए छोड़ देने वाली राज्यों सरकारों के पास कोई उत्तर नहीं होता हैं। समय रहते ना तो  गरीबों और जरूरतमंदों को अनाज व जरूरत की सामग्री के साथ ना ही आर्थिक मदद ही नसीब हो पाती हैं। देश के लोकतंत्र का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता हैं कि किसी राष्ट्रीय  और ज्वलंत समस्याओं पर सभी पार्टियों के शीर्ष नेताओं में कोई आपसी समन्वयन और एक मतैक्यता नहीं रहती हैं। यही कारण हैं कि काश्मीर से 370 और 34 धारा को हटाने में सत्तर साल से ज्यादा समय लगा। राष्ट्रहितों से जुड़ी समस्याओं पर ओछी राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियां या तो आज वे खत्म हो चुकी हैं या जनता ने स्वयं उनके अस्तित्व को नेस्तनाबूत कर या उखाड़कर सत्ता से बाहर फेंक दिया हैं। यह एक गंभीर चिंतन का विषय हैं कि सही मायने में लोकतांत्रिक देश में जनता को सरकारी स्तर पर केवल आम जनता को धक्कें ही खाने को मिलते रहे हैं। कोरोना काल में हर कोई जहां मौत और जिंदगी की जंग लड़ रहा था तब राज्यों की सरकारें माथे पर हाथ रखें नियोजन बनाने केवल बड़ी बड़ी बातें कर रही थी। यह तो भला हो  केन्द्र सरकार का कि उसने समय रहते परिस्थितियों का गंभीरता से मूल्यांकन कर हर स्तर की चुनौतियों के लिए समाधान कारक उपाय नियोजन कर रखें थे वरना भारत को ब्राजील,स्पेन, अमेरिका, चीन और फ्रांस में हुई कोरोना से मौतों के आंकड़ों तक पहुंचनें में केवल एक सप्ताह का ही समय लगता। कोरोना काल में हुई मौतों से अनाथ हुए बच्चों के लिए जिस तरह दुनिया के कई देशों ने व्यापक स्तर पर उनके सुरक्षित भविष्य को लेकर कदम उठाएं हैं उनकी तुलना में भारत सबसे फिसड्डी साबित हो चुका हैं। इसके लिए सबसे बड़ा कारण भारत की राजनीति ही हैं। जहां राज्यों में दूसरी पार्टियों की सरकारों के होने के कारण केन्द्र सरकार पर ही सारा ठिकरा फोड़ने और दोषारोपण करने के कारण अपने स्तर पर अनाथ बच्चों के लिए कुछ भी करने से सीधे सीधे अपना हाथ खींच रही हैं। समय रहते यदि राज्य सरकारों ने इन अनाथ बच्चों के लिए कोई कारगर नियोजन नहीं अपनाएं तो निश्चित ही समाज में एक नई सामाजिक समस्या का अभ्योदय होना अवश्यंभावी हैं। अपराध, भूखमरी, अपहरण, मानसिक और शारीरिक शोषण, अत्याचार और जुल्मों की किसी नई कहानी का भी उदय हो सकता हैं।

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