अपमान करना और सहना दोनों गलत

 अपमान करना और सहना दोनों गलत



अक्सर देखा जाता है कि संसार में सबल लोग निर्बलों का अपमान करते हैं। कई बार हम भी बिना कारण बहुतों का अपमान करते हैं और हमारा अपना अपमान भी बहुत बार होता है। संसार का सारा व्यवहार ही एक-दूसरे का अपमान करने पर टिका हुआ है जैसे मालिक नौकर का अपमान करता है, पति अपनी पत्नी का और पिता अपनी संतानों का अपमान करता है। संसार में शायद कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसे जीवन में कभी न कभी अपमान न सहना पड़ा हो। अपमानित व्यक्ति यदि शक्तिमान हुआ तो लड़ाई करता है और यदि निर्बल हुआ तो अपमान का जहरीला घूंट पीकर भी चुप रह जाता है, किंतु उसका मन अपमानित होकर हीन भावना से भर जाता है, उसे अपनी निर्बलता का बोध होता है और उसके आत्मविश्वास का नाश हो जाता है, अपमान सहते-सहते धीरे-धीरे अत्याचार सहने की उसे आदत सी पड़ जाती है। अब सवाल यह है कि लोग दूसरे का अपमान करते क्यों हैं? इसका उत्तर है कि अपमान करने वाला व्यक्ति स्वयं भी आत्मविश्वास से खाली होता है, वह दूसरों को छोटा साबित करके स्वयं को बड़ा सिद्ध करना चाहता है, दूसरे को दबाकर ही उसे अपनी शक्ति का एहसास होता है, उसे भय होता है कि यदि वह सामने वाले को नहीं दबाएगा तो सामने वाला उस पर हावी हो जाएगा और वह उसका गुलाम बन जाएगा, उसका शोषण होने लगेगा, वह दूसरों को अपना प्रतिद्वंदी मानता है, उसे संसार एक अविरत संघर्ष प्रतीत होता है, किंतु दूसरे को प्रतिद्वंदी मानने की बजाय यदि सहयोगी मान लिया जाए, यदि दूसरों के प्रति प्रेम और सौहार्द की भावना मन में हो तो कभी दूसरों का अपमान करने का विचार नहीं आएगा। आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्ति न तो किसी का अपमान कर सकता है और ना ही अपमान को स्वीकार कर सकता है।
       आदिकाल से ही हमारा समाज जाति और वर्गों में बॅऺटा हुआ है। ऊंची जाति और ऊंचे वर्गों वाले लोग सदा से अपने से नीची जाति और नीचे के वर्गों का अपमान करते रहे हैं, यहीं से अनेकों प्रकार के सामाजिक संघर्षों का जन्म होता है। जबकि हम सभी जानते हैं कि एक दूसरे के सहयोग के बिना इस संसार का चल पाना असंभव है, फिर भी अपने आप को श्रेष्ठ एवं महत्वपूर्ण साबित करने के लिए लोग अपने से कमजोर को सदैव दबाते रहे हैं और उनका शोषण करते रहे हैं। किसी कमजोर एवं मजबूर व्यक्ति को उसकी कमजोरी और मजबूरी का एहसास दिलाना कहां की श्रेष्ठता या महानता है? पर ऐसा करने में ना जाने लोगों को कौन से आत्मसंतोष का अनुभव होता है, क्या दूसरे को कमजोर साबित करके ही खुद को श्रेष्ठ साबित किया जा सकता है?
       बिना नींव के कोई भी इमारत खड़ी नहीं हो सकती, इसीप्रकार समाज के सभी जाति-वर्ग के लोग उस समाज के एक महत्वपूर्ण अंग होते हैं और हमें किसी का भी निरादर नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार परिवार में भी हर सदस्य का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान होता है, अतः परिवार का मुखिया यदि परिवार के अन्य सदस्यों को डरा-धमका कर रखेगा तो वह परिवार कभी भी खुशहाल नहीं रह सकता। छोटों का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है जितना कि बड़ों का, किंतु हम अक्सर देखते हैं कि बड़ों का सम्मान करने की बात तो की जाती है किंतु छोटों का सम्मान करने की बात कम ही सामने आती है। जो लोग उम्र में या पद में बड़े होते हैं वो छोटों को सम्मान देना अक्सर जानते ही नहीं, जिसका परिणाम यह होता है कि एक दिन वे स्वयं भी अपना सम्मान खो बैठते हैं। परिवार में या समाज में अक्सर देखा जाता है कि बड़ी उम्र के लोग अपने से छोटों को झिड़कते रहते हैं, जिससे छोटों के मन में धीरे-धीरे कुंठा का जन्म होने लगता है और फिर एक दिन वह भी आता है जब छोटे भी अपनी मर्यादा भूल कर बड़ों का अपमान करना शुरू कर देते हैं।
       हम सभी को चाहिए कि अपने से ज्यादा दूसरों के महत्व को समझें, दूसरों को आदर दें, तभी दूसरे हमें भी महत्व और आदर देंगे, वरना यदि हम किसी को अपमानित करेंगे तो यदि सामने वाला हमसे कमजोर है तो वो सामने चाहे ना बोले किंतु उसके मन में कभी भी हमारे प्रति श्रद्धा और प्रेम नहीं पैदा हो सकता, बल्कि उसका ह्रदय हमारे प्रति नफरत से ही भर जाएगा। दूसरे के हृदय में पैदा की हुई नफरत स्वयं के लिए ही घातक सिद्ध होती है, अतः हमें नफरत नहीं बल्कि दूसरे के मन में अपने लिए प्रेम का संचार करना चाहिए और इस प्रेम का संचार मीठी वाणी द्वारा ही हो सकता है।
       कितने ही बड़े शासक, अत्याचारी, बाहुबली अपनी-अपनी शक्ति दिखा कर इस दुनिया से विदा हो गए, कुछ अच्छे रूप में याद किए जाते हैं तो कुछ बुरे रूप में और ये सब उनके कर्मों पर ही निर्भर होता है, जो इस दुनिया में जैसे कर्म करके जाता है, वो यहां से जाने के बाद उसी रूप में याद किया जाता है, इस बात का हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए। यदि हम संसार में प्रेम की सुगंध फैला कर जाएंगे तो मरने के बाद भी ये दुनिया हमें याद करके श्रद्धा से शीश झुकाएगी और यदि नफरत फैलाकर जाएंगे तो मरने के बाद भी सदैव दुनिया हमें नफरत से ही याद करेगी। बुरे लोगों के नाम पर तो लोग अपना नाम रखना भी पसंद नहीं करते।
         हमारे कर्म संसार के लोगों को प्रेरित करते हैं, उन्हें शिक्षा देते हैं, अतः हम जो भी करते हैं उससे पूरी दुनिया प्रभावित होती है, इस बात का ध्यान रखना चाहिए और इसलिए बहुत सोच समझ कर ही कर्म करने चाहिए और मुंह से अच्छे या बुरे वाक्य निकालने चाहिए। हमारी भावनाओं की तरंगे धरती के सभी प्राणियों को प्रभावित करती हैं, यही कारण है कि सकारात्मक विचार वाले व्यक्ति लोगों को आकर्षित करते हैं और नकारात्मक विचार वाले व्यक्तियों से लोग दूर ही रहते हैं।


                                         रंजना मिश्रा ©️®️
                                        कानपुर, उत्तर प्रदेश

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