जीवन में योग का महत्व

 जीवन में योग का महत्व



योग का अर्थ होता है जुड़ना। ये सारी सृष्टि एक ऊर्जा को कई रूपों में प्रकट कर रही है, यही वैज्ञानिक तथ्य है। ये ऊर्जा कभी समाप्त नहीं होती बस उसका रूप बदल जाता है। ये ऊर्जा हम सबके भीतर है, ऊर्जा के महास्रोत को ही ईश्वर या परमात्मा के नाम से जाना जाता है। योग द्वारा हम अपने भीतर छुपी हुई उर्जा या ऊर्जा के उस महास्रोत से जुड़ते हैं।
          महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन में योग के आठ अंग बताए हैं, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। 8 अंगों में प्रथम अंग यम में पांच महाव्रत होते हैं, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इसका अर्थ है कि हम अहिंसावादी बनें, सदैव सच बोलें, सदैव ईमानदार रहें, संयमी बनें और सदैव संतोष करने वाले बनें यानी कि हम अपने जीवन में जितने कम साधन जुटाएंगे उतने ही सुखी रहेंगे। अष्टांग योग के दूसरे अंग नियम का अर्थ है जीवन को नियमबद्ध करना। जीवन को नियमों में बांधने के लिए जरूरी है, शौच,संतोष,तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। अर्थात हम जल द्वारा अपने बाहरी शरीर को पवित्र करें तथा विद्या और तप के द्वारा आंतरिक पवित्रता लाएं, हमारे जीवन में संतोष का होना बहुत जरूरी है, क्योंकि जिसके जीवन में संतोष नहीं होगा, वह सदा दुखी ही रहेगा। तप के द्वारा अपनी आंतरिक शक्ति को बढ़ाएं और स्वाध्याय करके यानी कि वेदों, उपनिषदों और महापुरुषों की जीवनी को पढ़कर उनसे प्रेरणा लें। ईश्वर प्रणिधान अर्थात ईश्वर के प्रति पूर्ण निष्ठा रखें और उनके प्रति समर्पित रहें। यम और नियम के बाद आता है आसन। आसन का अर्थ है एक स्थिर अवस्था में बैठना। चौथा अंग है प्राणायाम, श्वांस और प्रश्वांस की गति को नियंत्रण में लाना ही प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम का जीवन में बहुत महत्व है, जैसे-जैसे हम प्राणायाम करते हैं, वैसे-वैसे स्वस्थ होते जाते हैं। पांचवा अंग है प्रत्याहार, प्रत्याहार का अर्थ है मन और इंद्रियों का चित्त के अनुकूल हो जाना, यानी मन इन्द्रियों को और अपने आप को अंतर्मुखी कर लेता है तो इसे प्रत्याहार कहते हैं। धारणा का अर्थ है जहां पर चित्त और मन एकाग्र हो जाएं। सातवां अंग है ध्यान अर्थात जब नाभि चक्र या हृदय चक्र में कहीं भी ध्यान लग जाता है, तो जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है और दोनों एक हो जाते हैं। अष्टांग योग का आठवां अंग है समाधि, अर्थात जब आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं, तो जीवात्मा स्वयं को भूलकर परमात्मा के प्रकाशपुंज का दर्शन करने लगती है, इसी को समाधि कहते हैं।
       योग का विज्ञान स्वस्थ तन, स्वस्थ मन और आत्म बोध को उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण विज्ञान है, किंतु आज योग केवल फिजिकल एक्सरसाइज बनकर रह गया है, अर्थात शारीरिक फिटनेस के लिए योग एक पीटी परेड की प्रक्रिया बन गया है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर हमें सारी दुनिया को यह संदेश देने की आवश्यकता है कि योग के विज्ञान के वास्तविक मर्म को समझा जाए।
         योग मनुष्य के स्वास्थ्य व व्यक्तित्व के विकास के साथ-साथ आत्मसाक्षात्कार का भी विज्ञान है। महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए योग के आठ अंगों में आसन और प्राणायाम शरीर और प्राण के स्तर पर स्वस्थ रहने की शक्ति प्रदान करते हैं और अंतिम तीन चरण धारणा, ध्यान और समाधि, अंतरात्मा की साधना के रूप में आत्म साक्षात्कार की शक्ति उपलब्ध कराते हैं। आसन और प्राणायाम के साथ-साथ ध्यान का निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए, क्योंकि उसके बिना समाधि की अवस्था तक नहीं पहुंचा जा सकता। समाधि की अवस्था को प्राप्त करने का अर्थ है, जीवन में परम शांति, परम आनंद की अनुभूति करना, यही मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है‌।
         आज 21वीं सदी में जब मनुष्य के जीवन की रफ्तार इतनी तेज हो गई है, वह निरंतर दैनिक कार्यों में इतना व्यस्त हो गया है कि सामान्य जीवन जीना उसके लिए बहुत कठिन हो गया है तो इन परिस्थितियों में व्यक्ति के स्वस्थ शरीर और तनावमुक्त आनंदमय जीवन जीने का एकमात्र और सर्वाधिक शक्तिशाली उपाय है योग।
            जो व्यक्ति महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लेता है, उसके लिए यह जीवन एक खेल के सामान बन जाता है, यानी यदि व्यक्ति निरंतर आसन, प्राणायाम के साथ-साथ ध्यान की गहराइयों में उतरने का अभ्यास कर ले तो उसके अंदर साक्षी भाव से जीने की कला उत्पन्न हो जाती है, उसके अंदर आंतरिक रासायनिक परिवर्तन होने शुरू हो जाते हैं, जिन्हें लाने के लिए कोई साधना करने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि ये रूपांतरण स्वाभाविक रूप से स्वतः होने लगते हैं और इस प्रक्रिया से गुजकर व्यक्ति साक्षी भाव में जीने लगता है, उसका पूरा जीवन ही एक खेल सा बन जाता है और वह खेल-खेल में ही इस रहस्य का पता लगा लेता है कि मैं कौन हूं। जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि 'मैं कौन हूं', इसका उत्तर मिल जाए तो फिर कुछ पाने को शेष नहीं रहता, किंतु इसका उत्तर बाहरी माध्यम से नहीं पाया जा सकता बल्कि अपने भीतर से ही इसे जाना जा सकता है और इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त होता है केवल योग के विज्ञान के द्वारा।

रंजना मिश्रा ©️®️
कानपुर, उत्तर प्रदेश

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