क्या भारत विश्वगुरु बनने को तैयार है?

क्या भारत विश्वगुरु बनने को तैयार है? 


जहां एक तरफ प्राचीन भारत, जिसको शकुंतला के पुत्र राजा भरत ने नाम दिया,  एक पुत्री के रूप में समृद्ध होकर सोने की चिड़िया बनी वही दूसरी तरफ राजनीति, अर्थव्यवस्था,साहित्य, चिकित्सा,सभ्यता,  और संस्कृति का ज्ञान दुनिया को देकर विश्वगुरु बन कर इस पवित्र भूमि को गौरवान्वित किया और पूरी दुनिया को अपना कायल बनाया। लेकिन यही समृद्धि कुछ लालची आक्रान्ताओं को चुभने लगी और उन लोगो ने उसको लूटना शुरू कर उसकी गरिमा को तार तार कर उसपर कई सौ वर्षों तक राज किया।जिसके कारण उसकी समृद्धि का विनाश हो गया और वो उनकी गुलाम बन गयी। लेकिन उसके पुत्रो ने उस को बचाने के लिये उन आक्रमणकारियों का न केवल सामना किया बल्कि अपने बलिदान भी दिया जिसके परिणामस्वरूप वो गुलामी की जंजीरों को तोड़ एक बार फिर वो विश्वगुरु बनने की और अपने कदम बड़ा रही है।

पर आज के हालात देख क्या हम कह सकते है कि भारत फिर एक बार विश्वगुरु बन सकता है? विश्वगुरु यानी विश्व को पढ़ाने वाला शिक्षक या विश्व को अंधकार से प्रकाश की और लेजाने वाला मार्गदर्शक। अगर हम भारत की वर्तमान स्थिति देखे तो भारत आज फिर से समृद्धशाली बनता जा रहा है।चाहे वो आर्थिक क्षेत्र हो या चिकित्सा का क्षेत्र हो, रक्षा क्षेत्र हो या अंतरिक्ष की दुनिया हो, विज्ञान हो या प्रौद्योगिकीय क्षेत्र हो, कृषि क्षेत्र हो या फिर उत्पादन क्षेत्र हो। लेकिन क्या ये काफी है विश्वगुरु बनने के लिये? ऐसे समृद्ध देश तो आज सभी विकसित देश भी है। सच्चाई ये है कि आज हम सिर्फ विकसित देशो की नकल कर रहे उनकी सभ्यता, संस्कृति और शिक्षा को अपना कर अपनी बहुमूल्य, गौरवशाली सभ्यता, संस्कृत और शिक्षा का इतिहास भूल गए है। स्वतंत्रता के बाद भी कमजोर सरकार और स्वार्थी नेतृत्व ने देश की नींव को ओर खोखला कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप देश स्वतंत्र तो हो गया पर भारतवासियों की सोच स्वतंत्र नही पाई और गुलामी की जंजीरों मे वैसे ही जकड़ी रही। जो खुद गुलाम हो वो दुसरो को क्या दे सकता है?परन्तु कहीं न कहीं देश का हित सोचने वाले लोगों के द्वारा देश और इसकी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की कामयाब कोशिश की गई लेकिन धीरे धीरे देश के नेता अपने वोट बैंक के लिये देश को धर्म जाति मे विभाजित करते गए और अपना स्वार्थ साधने लगे और जनता के पैसे अपनी तिजोरियों मे भरने लगे। सरकार परिवारवाद तक सीमित हो गयी और नेता जातिवादी हो गए,सरकारी तंत्र को घूसखोरी रूपी दीमक लग गया और सरकारी अधिकारी भ्रष्ट होते चले गए। नई पीढ़िया सिर्फ़ पढ़ लिख कर बड़ी-बड़ी उपाधियाँ ग्रहण कर सिर्फ पैसे कमाने में लग गयी और और अपनी संस्कृति, सभ्यता को भूल पश्चिमी सभ्यता में डूब गई और इसका मूल कारण हमारी शिक्षा रही जो अंग्रेजो ने हमे  शिक्षा दी वही शिक्षा हमको आजादी के बाद भी प्राप्त हो रही है। जिससे देश का गौरवशाली इतिहास खो गया और नई पीढ़ी को देश से, देश की संस्कृति से कोई प्यार नही रहा।।दूसरी तरफ देश के दुश्मन देश को अंदर से खोखला ओर तोड़ने में लग गए। कानून अमीरों, सत्ताधारियो और समर्थवान लोगो के घर की जागीर बन गया। और देशद्रोहियो को पनाह देने लगा।

लेकिन एक बार फिर नियति ने करवट ली और देश मे अभूतपूर्व परिवर्तन हुए जिसने देश की जनता की आंखों मे फिर से देश को विश्वगुरु बनने का सपना बुनने लगा है। 



क्या हम विश्वगुरु बन सकते है? हमको क्या बदलाव करने होंगे? सरकार और जनता की क्या भूमिका होनी चाहिए? 

अपने अतीत के गौरव को फिर से प्राप्त करने की दिशा में अभी बहुत से आवश्यक कार्ये करने होंगे क्योंकि फिर से विश्व गुरु पद को प्राप्त करना आसान नही है। इसे नए सिरे से हासिल करना होगा। हमारे लोगों को आधुनिक समय के अनुरूप नई सोच के साथ अपनी जड़ों से जुड़ना होगा। और दुनिया मे खुद को साबित करना होगा।

इसके लिए हमको विश्वगुरु बनने से पहले विश्वछात्र बनना पड़ेगा। और प्राचीन भारत रूपी गुरु से सीखना पड़ेगा। क्योंकि कोई भी वृक्ष अपनी जड़ों से अलग होकर फलफूल नही सकता और खुद की कमियों को दूर करने के लिये अपने अतीत रूपी गुरु से सीखना होगा जो हमे विश्वगुरु बनने के मार्ग को प्रशस्त करेगा।

प्रसन्नता की बात ये है कि कुछ सालों से देश की जनता अपनी संस्कृति और सभ्यता के बारे मे जान ही नही रहे बल्कि उसपर गर्व करते हुए अपना भी रही है। और देश तोड़ने वाली ताकतों को मुंहतोड़ जवाब भी दे रही। हमारी सरकार भी हमारी संस्कृति और सनातनी सोच जैसे योग और वसुधैव कुटुम्बकम को दुनिया मे पहुँचाकर दुनिया मे शांति, स्वास्थ्य,प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया है। इसके अलावा भी बहुत कुछ करना बाकी है एक सशक्त और अखंड राष्ट्र बनाने के लिए तभी तो भारत विश्वगुरु बन पाएगा। 

वर्तमान में सारी दुनिया में दो तरह की प्रभुता है समाजवाद और पूंजीवाद लेकिन भारत को पूंजीवाद और समाजवाद का ऐसा संतुलन तलाश कर सकता है जिसे दुनिया अपना सके।और ज्यादा खुशहाल हो सके।

आज विश्व में कई देश तानाशाह सरकारों के अधीन पीडि़त हैं। भारत उन्हें आगे बढ़ने की राह दिखा सकता है।क्योंकि उसके पास दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्रों में से एक है, परंतु हमारी जनता की सहभागिता मतदान तक ही सीमित है। और राजनीतिक पार्टियों लोकतांत्रिक न होकर परिवारों तक सीमित हो गयी है।जिससे देश मे अराजकता फैल रही है वोटबैंक ओर सत्ता की लालच के चलते देश मे मुफ्तखोरी, नेतायों और चुनाव टिकटो की खरीद फरोख्त की बीमारी फैलती जा रही है। भ्रष्टचार बढ़ रहा है और करदातायो का धन बर्बाद हो रहा है। धीरे धीरे देश धर्म जाति मैं बंट रहा है।जिसपर लगाम लगाना बहुत आवश्यक है दूसरी तरफ देश की जनता जागरूक, शिक्षित और देशभक्त होना चाहिए और अपने वोट की कीमत समझना चाहिये तभी देश और पार्टियों के अंदर भी सच्चे लोकतंत्र की स्थापना हो सकेगी ओर ये संदेश पूरी दुनिया को हम दे सकेंगे।

भारत शुरू से बहुत जटिल समस्या से जूझता आ रहा है वो है देशद्रोहिता, लालच, सत्ता का मोह और धर्म जाति हिंसा। जिसने न केवल देश को कई सौ सालों तक गुलाम बनाया बल्कि आज भी देश की अखंडता के लिये एक बहुत बड़ी खतरा है। आज भी देश के अंदर देशद्रोही बड़ी मात्रा मे है जो आम जनता को धर्म जाति के नाम पर भड़का रहे है और अंदर से देश को खोखला कर देश तोड़ने का कार्ये कर रहे और इनकी सहायता देश के दुश्मन कर रहे है। इसके लिए सरकार को ऐसे लोगो से निपटने के लिये देश की कानूनी व्यवस्था को मजबूत करना चाहिये और सभी के लिये कानून एक होना चाहिये। जब हम अंदर से मजबूत होंगे तभी हम दुनिया के सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर सकेंगे। 

विश्वगुरु बनने के लिए आधुनिक परिपेक्ष में हमारी आंतरिक और बाहरी समस्याओं के निवारण सख्ती से करने होेंगे। ऐसा नही है कि भारत के पास अद्वितीय शक्तियां नहीं हैं। दरअसल इसके पास सार्वभौमिक दर्शन, स्वाभाविक सहिष्णु धर्म, बड़ा भू-भाग, युवा आबादी, लोकतंत्र, प्राचीन सभ्यता और संस्कृति, भाषा और विविधता का ऐसा दुर्लभ संयोजन है जिसकी बराबरी कोई और देश नहीं कर सकता। लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि इन ताकतों को व्यर्थ गंवाने के बजाय उनका जमीनी स्तर पर सही इस्तेमाल हो।

*नोट-* ये लेख केवल लेखक की सोच का परिणाम नही है बल्कि देश की हज़ारो जनता,कई संगठनों के अधिकारियों के विचारों का संकलन है जो हमने उनसे कई हफ़्तों की मेहनत करके टेलीफोन, सोशल मीडिया और बातचीत के माध्यम से जाना है।


                         *दीप्ति डांगे, मुम्बई*

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