1 जनवरी को बदलता वर्ष या कैलेंडर

 1 जनवरी को बदलता वर्ष या कैलेंडर



*लेखिका दीप्ति डांगे, मुंबई*


वर्तमान में दुनिया के अधिकतर देश 1 जनवरी से नया साल मनाते हैं। लेकिन प्राचीन काल मे, रोमन कैलेण्डर में वर्ष का शुभारम्भ 1 मार्च से होता था। और वर्ष मात्र 10 माह होते थे। रोम का सबसे पुराना कैलेंडर वहां के राजा न्यूमा पोंपिलियस के समय का माना जाता है।1 जनवरी से नया साल मनाने की शुरुआत पहली बार 46 ईसा पूर्व में रोमन राजा जूलियस सीज़र द्वारा खगोलविदों के साथ गणना करके जूलियन कैलेंडर लागू किया गया जो रोमन कैलेंडर को सुधार करके बनाया गया था। जूलियन कैलेंडर में दो प्रकार के वर्ष होते थे- 365 दिनों के "सामान्य" वर्ष और 366 दिनों के "लीप" वर्ष। तीन "सामान्य" वर्षों का एक सरल चक्र होता है जिसके बाद लीप वर्ष होता है और यह पैटर्न बिना अपवाद के लिये दोहराया जाता रहा। जूलियन कैलेंडर के अनुसार वर्ष औसत 365 दिन 6 घंटे लंबा होता था।और वर्ष 12 माह का जिसके नाम भी रोमन देवता के ऊपर रखे गए थे।यह रोमन, यूरोप के अधिकांश, और अमेरिका और अन्य जगहों पर यूरोपीय बस्तियों में मुख्य कैलेंडर था।धीरे धीरे रोमन साम्राज्य का पतन होता गया और ईसाई धर्म का प्रसार उतना बढ़ता गया। और ईसाई धर्म के लोग 25 मार्च या 25 दिसंबर से अपना नया साल मनाने लगे।

लेकिन जूलियन कैलेंडर में की गई समय की  गणना बहुत हद्द तक सही थी बस उसमे थोड़ी से कमी थी एक साल में 365 दिन 6 घंटे ना होकर  365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकंड होते हैं।मतलब जूलियन कैलेंडर के हिसाब से हर साल 11 मिनट 14 सेकंड ज्यादा गिने जा रहे थे।इससे हर 400 साल में समय 3 दिन पीछे हो रहा था।ऐसे में 16वीं सदी आते-आते समय लगभग 10 दिन पीछे हो चुका था।समय को फिर से नियत समय पर लाने के लिए रोमन चर्च के पोप ग्रेगरी 13वें ने इस पर काम किया और 1582 के कैलेंडर में 10 दिन बढ़ा दिए  5 अक्टूबर से सीधे 15 अक्टूबर की तारीख रखी गई साथ ही लीप ईयर के लिए नियम बदला गया।अब लीप ईयर उन्हें कहा जाएगा जिनमें 4 या 400 से भाग दिया जा सकता है।सामान्य सालों में 4 का भाग जाना आवश्यक है।वहीं शताब्दी वर्ष में 4 और 400 दोनों का भाग जाना आवश्यक है।ऐसा इसलिए है क्योंकि लीप ईयर का एक दिन पूरा एक दिन नहीं होता है।उसमें 24 घंटे से लगभग 46 मिनट कम होते हैं।जिससे 300 साल तक हर शताब्दी वर्ष में एक बार लीप ईयर ना मने और समय लगभग बराबर रहे।लेकिन 400वें साल में लीप ईयर आता है और गणना ठीक बनी रहती है।जैसे साल 1900 में 400 का भाग नहीं जाता इसलिए वो 4 से विभाजित होने के बावजूद लीप ईयर नहीं था।जबकि साल 2000 लीप ईयर था।इस कैलेंडर के अनुसार नया साल 1 जनवरी से मनाया जाने लगा।और उस कैलेंडर को ग्रेगोरियन कैलेंडर के नाम से जाना गया। इस कैलेंडर को स्थापित होने में समय लगा। इसे इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने उसी वर्ष में ही अपना लिया था।जबकि जर्मनी के कैथोलिक राज्यों, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड , पोलैंड  हंगरी जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश और डेनमार्क, ने धीरे धीरे इस कैलन्डर को अपनाया। परन्तु अंग्रेजों ने ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाने में 150 सालों से भी ज्यादा समय लगा। चीन ,रूस और जापान ने इसको 19 शताब्दी में  अपनाया। ग्रेगोरियन कैलेंडर को अब अंग्रेजी कैलेंडर भी कहा जाता है। ।सन 1752 में भारत  ब्रिटेन का राज होने के कारण भारत ने इस कैलेंडर को 1752 में ही अपनाया था।लेकिन भारत में आज भी लगभग हर राज्य का अपना एक नया साल होता है।जो अलग अलग तिथियों और माह में मनाया जाता है।अधिकांश ये तिथि मार्च और अप्रैल के बीच में पड़ती है। हिंदू नववर्ष भारतीय कैलेंडर या पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से नया साल मनाया जाता है।भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि :- 


चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि

शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। - ब्रह्म पुराण 


भारत का पहला कैलेंडर संवत 57 ईस्वी पूर्व बना जिसको उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने प्रारंभ किया था।उनके समय में सबसे बड़े खगोल शास्त्री वराहमिहिर थे। जिनके सहायता से ये पंचांग बनाया गया जिसे विक्रम संवत के नाम से जाना गया। ये अंग्रेजी कैलेंडर से 57 वर्ष आगे है, 2022 + 57 = 2079  चल रहा है। आधुनिक युग मे सनातन धर्मावलम्बियों के समस्त कार्यक्रम जैसे विवाह, नामकरण, गृहप्रवेश, वर्ष भर के पर्व, उत्सव एवं अनुष्ठानों के शुभ मुहूर्त विक्रम संवत कैलेंडर के अनुसार निश्चित होते हैं।

लेकिन हिंदू पञ्चांग या कैलेंडर की उत्पत्ति वैदिक काल में ही हो चुकी थी।जो भारत के प्राचीन वैदिक ऋषियों की पद्धति मानी जाती है और आज के वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है या ऐसा कहे कि वैदिक पद्धति पर आज की वैज्ञानिक पद्धति आधारित है क्योंकि संपूर्ण विश्व को खगोल विज्ञान देने का श्रेय भारत को ही जाता है।ऐसा माना जाता है कि वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वैदिक काल के आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कर आदि ऋषि मुनि वैज्ञानिकों एवं खगोलशास्त्रियों ने वेदों और अन्य ग्रंथों में वर्णित सूर्य, चंद्र, पृथ्वी और नक्षत्र सभी की स्थिति, उनकी दूरी और गति भारतीय ऋषियों ने गहन अध्ययन और शोध कर पञ्चांग को विकसित किया था। जो आज भी पूरे विश्व में विश्वसनीय एवं प्रशंसनीय है। उससे धरती और ब्रह्मांड का समय निर्धारण किया जा सकता हो अर्थात धरती पर इस वक्त कितना समय बीत चुका है और बीत रहा है और ब्रह्मांड अर्थात अन्य ग्रहों पर उनके जन्म से लेकर अब तक कितना समय हो चुका है- यह निर्धारण करने के लिए उन्होंने एक सटीक ‍समय मापन पद्धति विकसित की थी।पञ्चांग पाँच प्रमुख भागों से बने हैं, यह हैं - तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इनकी गणना के आधार पर हिंदू पञ्चांग की तीन धाराएँ हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित। जो आज भी भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है। विज्ञान के अनुसार विश्व का सबसे छोटा तत्व परमाणु है। हमारे प्राचीन विद्वानों ने भी कालचक्र का वर्णन करते समय काल की सबसे छोटी इकाई के रूप में परमाणु को ही स्वीकारा है। वायु पुराण में दिए गए विभिन्न काल खंडों के विवरण के अनुसार, दो परमाणु मिलकर एक अणु का निर्माण करते हैं और तीन अणुओं के मिलने से एक त्रसरेणु बनता है। तीन त्रसरेणुओं से एक त्रुटि, 100 त्रुटियों से एक वेध, तीन वेध से एक लव तथा तीन लव से एक निमेष (क्षण) बनता है। इसी प्रकार तीन निमेष से एक काष्ठा, 15 काष्ठा से एक लघु, 15 लघु से एक नाडिका, दो नाडिका से एक मुहूर्त, छह नाडिका से एक प्रहर तथा आठ प्रहर का एक दिन और एक रात बनते हैं। दिन और रात्रि की गणना साठ घड़ी में भी की जाती है।मतलब एक घंटे को ढाई घड़ी के बराबर कहा जा सकता है। एक मास में 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। सूर्य की दिशा की दृष्टि से वर्ष में भी छह-छह माह के दो अयन माने गए हैं- उत्तरायण तथा दक्षिणायन। वैदिक काल में वर्ष के 12 महीनों के नाम ऋतुओं के आधार पर रखे गए थे। बाद में उन नामों को नक्षत्रों के आधार पर परिवर्तित कर दिया गया, जो अब तक यथावत हैं। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन। 

विश्व के अधिकांश देशों में कालचक्र को सात-सात दिनों में बांटने की प्रथा भारत से ही प्रेरित है। बाद में इसे लोगों ने अपनी अपनी मान्यताओं से जोड़ लिया। भारत में सप्ताह के सात दिनों के नाम ग्रहों के नाम एवं उनके प्रभाव के आधार पर रखे गए। जैसे रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार तथा शनिवार। सूर्य को आदित्य भी कहते हैं, इससे रविवार को आदित्यवार भी कहते थे, जो बाद में बिगड़कर इतवार हो गया।

 ये कहना अतिशयोक्ति नही होगी कि भारतीय कैलेंडर को देखकर ही दुनियाभर के कैलेंडर बने थे। बारह महीने का एक वर्ष और सात दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। जिसे रोमन, अरब, मिस्र और यूनानियों ने भी अपनाया था। बाद में अपने स्थानीय समय और मान्यता के अनुसार लोगों ने इसमें फेरबदल कर दिया। पहले धरती के समय का केंद्र उज्जैन हुआ करता था।

भारत में सांस्कृतिक विविधता के कारण आज भी अनेक काल गणनायें प्रचलित हैं जैसे- विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी संवत, फसली संवत, बांग्ला संवत, बौद्ध संवत, जैन संवत, खालसा संवत, तमिल संवत, मलयालम संवत, तेलुगू संवत आदि जो अलग अलग जाति और समुदाय द्वारा नव वर्ष भी अलग अलग तिथि पर मनाती है। 


शक संवत और राष्ट्रीय संवत

शक संवत को सरकारी रूप से अपनाने के पीछे ये वजह ग्रेगोरियन कैलेंडर की असंगता जैसे विभिन्न महीनों में दिनों की संख्या अलग-अलग क्यों है? फरवरी में 28 या 29 ही दिन क्यों हैं जबकि बाकी महीनों में 30 या 31 दिन रखे गए हैं? 

ग्रेगोरियन कैलेंडर से यह भी पता नहीं लगता कि महीना या वर्ष सप्ताह के किस वार से शुरू होगा। 

इसलिये राष्ट्रीय कैलेंडर में शक संवत् का प्रयोग किया जाता है।जो अंग्रेजी कैलेंडर से ये 78 वर्ष पीछे है, 2021 - 78 = 1943 इस प्रकार अभी 1943 शक संवत चल रहा है। 


ग्रेगोरियन कैलेंडर

ग्रेगोरियन कैलेंडर सौर वर्ष पर आधारित है और पूरी दुनिया में इसका इस्तेमाल होता है. ग्रेगोरियन कैलेंडर के महीने 30 और 31 दिन के होते हैं, लेकिन फरवरी में सिर्फ 28 दिन होते हैं. फिर प्रत्येक चार साल बाद लीप ईयर आता है जिसमें फरवरी में 29 और वर्ष में 366 दिन होते हैं। 


हिब्रू कैलेंडर

हिब्रू कैलेंडर ग्रेगोरियन कैलेंडर से भी पुराना है।यहूदी अपने दैनिक काम-काज के लिए इसका प्रयोग करते थे। इस कैलेंडर का आधार भी चंद्र चक्र ही है, लेकिन बाद में इसमें चंद्र और सूर्य दोनों चक्रों का समावेश किया गया।इस कैलेंडर का पहला महीना शेवात 30 दिनों का और अंतिम महीना तेवेन 29 दिनों का होता है. 


हिज़री कैलेंडर

हिज़री कैलेंडर का आरंभ 16 जुलाई 622 को हुआ।ऐसा कहा जाता है कि इस दिन इस्लाम के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद मक्का छोड़कर मदीना को प्रस्थान कर गए थे।इस घटना को हिजरत और हिजरी संवत चंद्र वर्ष पर आधारित मानते हैं। इसमें साल में 354 दिन होते हैं।सौर वर्ष से 11 दिन छोटा होने के कारण कैलेंडर वर्ष के अंतिम माह में कुछ दिन जोड़ दिए जाते हैं। 


पारसी नववर्ष 

पारसी धर्म का नया वर्ष नवरोज उत्सव के रूप में मनाया जाता है। आमतौर पर 19 अगस्त को नवरोज का उत्सव मनाया जाता है। 3000 वर्ष पूर्व शाह जमशेदजी ने नवरोज मनाने की शुरुआत की थी। 


पंजाबी नववर्ष

पंजाब में नया साल वैशाखी पर्व के रूप में मनाया जाता है। जो अप्रैल में आती है। सिख नानकशाही कैलेंडर के अनुसार होली के दूसरे दिन से नए साल की शुरुआत मानी जाती है। 


हिंदू नववर्ष

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से | हिंदू नववर्ष का प्रारंभ चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नया संवत भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल की शुरुआत होती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि अप्रैल में आती है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादी आदि नामों से भारत के कई क्षेत्रों में मनाया जाता है।विक्रम संवत् विश्व का सर्वश्रेष्ठ सौर-चांद्र सामंजस्य वाला संवत् है। 


जैन और गुजराती नववर्ष

जैन नववर्ष दीपावली के अगले दिन से शुरू होता है। इसे वीर निर्वाण संवत भी कहा जाता है। इसी दिन से जैनी और गुजराती समुदाय अपना नया साल मनाते हैं।


नववर्ष वह समय है जब कैलेडर बदल जाता है।उत्सव, मुहूर्त, तिथियां, काल फिर से शुरू हो जाते है और कैलेंडर वर्ष में एक साल की वृद्धि होती है।दुनिया के अधिकांश देशों में एक जनवरी को नववर्ष मनाया जाता है जो ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित है। और उनके सारे त्योहार, उत्सव, काल, शादी विवाह, तिथियां इसी कैलेंडर पर आधारित होते है।लेकिन भारत में 1 जनवरी को सिर्फ हम अपना कैलेंडर बदलते हम भारतीय सही मायने में नववर्ष अपने क्षेत्र, जाति, और समुदायों के अनुसार ही मनाते है। क्योंकि हमारे त्योहार, उत्सव, शुभ कार्ये  अपने भारतीय पंचांगों के अनुसार होते है। न कि अंग्रेजी कैलेडर के अनुसार इसलिये सभी भारतवासियों को कैलेंडर बदलने की हार्दिक शुभकामनाएं। आप सभी का समय शुभ हो।

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