*हार क्या है?*


*लेखिका- स्नेहा दुधरेजीया गुजरात पोरबंदर*


जब कभी ऐसा लगने लगे कि, आप कुछ नही कर सकते, एक हारे हुए इंसान की तरह लाचार और कमजोर महसूस करने लगते हैं।आखों के आगे अंधेरा छाया रहता है ?भविष्य अंधकारमय दिखता है ?

ऐसी परिस्थिति में एक बार ये जरुर सोचना चाहिए कि, हम बाहर की चुनौतियों से नही हारते है बल्कि, हम अपने अंदर की चुनौतियों से हारते है।

हम मनुष्यों की यह खासियत होती है कि, जब तक हम खुद से हार  नही  जाते, तब तक हमें कोई हरा नही सकता ।

हम जब भी हारते  है तो, बस हम, हमारी अंदर की कमजोरियों से हारते है। तो क्या  हमारे जीवन में आनेवाली कठिन घड़ी में हार मानकर बैठ जाना सही  है? सच कहु तो ये सही नही है। हम खाना क्यूं खाते है , अपने लिये ही ना, सांस लेते है अपने लिए, जीवन जीते है अपने लिए, तो फिर हम क्यों दुसरो के लिये  जिये या फिर दुसरो के बारे मे 

सोचे?

मेरे कहने का मतलब यह है कि, हम जब कोई काम करते है तो,  उस काम को लेकर जब कोई यह कहता है कि, तुमसे नही होगा?

उस वक्त हम कही न कही ,थोडा या ज्यादा अपने अंतर्मन के आत्मविश्वास को खो बेठते है।

 यह सही है क्या?  मुझे नही लगता ये सही है। सही तब है जब पुरी दुनियां ये कहे तुमसे नही होगा और तुम एक गहरी सांस लेकर , अपनेआप से कहो कि, कोई बात नही भाई मुझे  करनी भी नही है । तब जो पोजीटीविटि आती हे ना वो कमाल कि होती है। 

जीवन में जब ऐसा लगे कि, हम सब कुछ हार चुके है और ,अब कुछ नही  हो सकता? तब हार मानने की बजाय या किसी कि, खरी खोटी सुनने की जगह  खुद से लड़ना सीख लेना चाहिए । 

अरे भाई खुद के साथ फाईट नही करनी है, या खुद को थप्पड़ नही मारना है। हाँ आप चाहो तो मार सकते हो। और  बाहर की चुनौतियो से हार मानकर  बेठने कि बजाय खुदसे लड़कर , फिर से जीतने की  तैयारी करना चाहिए।

मेरे कहने का मतलब यह है कि, जब इन्सान  सोच  लेता है कि,एकबार असफलता मिलने के बाद  सब खत्म??

ऐसा नही  होता है, हम  हारते है तो,बस हमारी  कमजोरियों से ।हमें हमारें कमजोरियों से लड़ना आना चाहिए,हमें अपनी कमजोरियों से लड़ना सिखना चाहिये। 

बस एकबार यह कला हमने सीख ली तो फिर समझो दुनिया जीत ली।

जिंदगी मे मिलने वाली हार, बस मन कि  हार होती है। मन को स्ट्रोंग बनाकर देखो फिर हार भी गले का  हार बन जायेगी।

हार क्या है ?मन का वो वहम है जो जीती हुई बाजी भी हरा सकता है। जीत वो ताकत है जो हमारी कमजोरियों मे छिपा है । जरूरत है तो उस जीत को जानने की।

हार से हार मान लेने की अपेक्षा हमें उनसे हारने कि बजाय  खुदसे जीतने कि कोशिश करनी चाहिये। 

हमें  हमारी कमजोरियों को एक झोले मे भर कर नदी में या गहरे खाई में मे फेक देना चाहिये। तभी हम कुछ कर सकते हे। 

हम इंसान हैं ,हमे कोई हरा नही  सकता है, अगर जिद हो जीतने कि, तो हार भी हार मान लेती हे।

हार क्या है, मन में छुपा वो डर हे जो हमे जीतने नही देता है, हार वो डर है जो, हमारी कमजोरि जिसके कारण जीत भी हार में बदलने लगती है।

क्या हुआ अगर कभी कुछ हमसे न हो सका तो?

 शायद सही वक्त न आया हो ,या हमारी किस्मत में कुछ बेहतरीन लिखा  हो।

 जिसे हम हार मानकर बैठ जाते हे वो हार नही है , बस सोचने का थोडा नजरिया बदलना चाहिये।

हार से हार कर नही ,हार से लड़ कर जीतना चाहिए। हार बस हमारे मनका वो वहम है ,जो मन को स्लोमोशन जहर कि तरह मारने लगता हे, और उस जहर का कोई ईलाज नही  है। तो हमे खुद ही  इन सारी कमजोरियों को जड़ से हि मिटाना होगा। फिर देखो हम जबतक खुद से हार नहिं मानते तब तक हमे कोई नही हरा सकता। तो जियो  जी भरके ।

खुद को स्ट्रोंग बनाकर मन को मजबूत  बनाकर जीतने की कोशिश करनी चाहिये। ये कोशिश  ही  हमे जी दिला  देगी । 

ये कमजोरियों को दीमक बनने नही देना चाहिए,  नही तो ये कमजोरी  जिंदगी को खोखला  कर देगी ।हार को हराकर जीतना है, और जो इंसान कमजोरियों को हरा सकता हे उसे कोई नही हरा सकता।

कहते हे ना के life is Goldan piriod of joy तो जियो  जी भर के।

 हार जिंदगी नही है ,हार तो सिर्फ जिंदगी का एक हिस्सा है।ये  तो सुना है ना कि, अगर पानी की धार अविरत पत्थर पर पड़ती है तो ,उस पर भी निशान पड़ जाता है ,कहने का मतलब ये है कि, मेहनत से सब कुछ जीता जा सकता है और मिली हुई हार को भी मेहनत से जीता जा सकता है ,तो चलो ना मेहनत  करते है ,मेहनत के दम पर दुनिया  जीत लेते है ।

हमारे अंदर कि कमजोरियों से भागने कि वजाय उन कमजोरियों का फायदा उठाकर उनको हमारी ताकत बनानी चाहिये। 

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