ईश्वर के प्रति आस्था के साथ पितृ के प्रति भी आस्था रखनी होगी

ईश्वर के प्रति आस्था के साथ पितृ के प्रति भी आस्था रखनी होगी,

तभी मानव कल्याण संभव 

                    (लेखिका-सुनीता कुमारी) 


सबसे ज्यादा झुकाव इस दुनिया में लोगो का किसी चीज के प्रति है तो वो है "धर्म"। भले ही धर्म के मूल को सही से न जाने ,भले ही धर्म के नियम को न माने ,भले ही  धर्म में लिखी बातों का मानव कल्याण के लिए उपयोग न करे परंतु मनुष्य की सारी गतिविधी धर्म पर ही आश्रित है।

सबसे ज्यादा नुकसान अगर इंसान को किसी चीज से होता है तो वो है धर्म के गलत दुष्प्रचार से ,धर्म का निजी स्वार्थ के लिए, गलत प्रचार प्रसार से ।

सनातन धर्म में भी यही बात लागू है।जो वास्तव में धर्म के ज्ञाता है ,समाज कल्याण करना चाहते है वे ही धर्म की मुल बाते लोगो को बताते है वे ही साधु ,पंडित है,गुरू है ।बाकी ढ़ोगी, साधू ,लोगो को मुर्ख ही बनाते है रुपया ऐठते है।इन्ही ढोंगी, पंडित ,साधूओ की वजह से लोगों में धर्म के प्रति निराशा का भाव आता है।

वैसे भी आधुनिक युग में, समय के साथ लोगो की सोच में भी परिवर्तन आ गया है।प्राचीन बहुत सारी परंपराए ,मान्यताएं ,जीवन में होनेवाले संस्कार को आज की युवा पीढ़ी नकार रही है।खासकर कर कोरोना की वजह से सारी परम्पराएं, मान्यताएं ,संस्कार कमजोर हो गई है। कोरोना काल में ऐसी स्थिति बनी है जिसने समाज की सारी व्यवस्थाओं को झुठला दिया है।पचास लोगों में शादी, बीस लोंगो में विवाह।

स्थिति तो ऐसी बनी की श्राद्ध एवं अंतिम संस्कार में एक भी लोग उपस्थित नही होते थे, लोग किसी तरह अपने प्रियजन का अंतिम संस्कार में भी ना जा रहे थे।

इन सब परिस्थितियों ने कई सवाल खड़े कर दिए है? खासकर श्राद्धकर्म की प्रकिया का महत्व पूरी तरह से कमजोर हो गया है।

पहले से ही युवा पीढ़ी श्राद्धकर्म को अंधविश्वास का नाम  देती रही है ,वर्तमान समय में इसे और बल मिल गया है।इसे लेकर कई प्रश्न  युवा पीढ़ी करते है कि, क्या श्राद्ध की अवधि में ब्राह्मणों को खिलाया गया भोजन पितरों को मिल जाता है? ??अथवा दान की गई वस्तु सचमुच में मरनेवालों को मिलती है।

मन में ऐसे प्रश्न उठना स्वाभाविक है। एकल परिवारों के इस युग में कई बच्चों को अपने दादा-दादी या नाना-नानी के नाम तक नहीं मालूम होते हैं।ऐसे में परदादा या परनाना के नाम पूछने का तो कोई मतलब ही नहीं होता है।

यही स्थिति रही तो आने वाली पीढ़ियां सारी प्राचीन नियमों को भूल जाएगी ।हमारे सनातन धर्म में सारी विधियों ,परम्परागत नियमों का कोई न कोई वैज्ञानिक कारण जरूर होता है ।इस लिए सारे नियम का विधिवत वैसे ही अगली पीढ़ी तक पहुंचना जरूरी है।पूर्वज तथा,परिवार का नाम ,इसलिए श्राद्ध के महत्व को समझना बहुत जरूरी है।

सदियों से चली आ रही भारत की इस व्यावहारिक परंपरा का निर्वहन जरूरी है।श्राद्ध कर्म का एक समुचित उद्देश्य है, जिसे धार्मिक कृत्य से जोड़ दिया गया है। दरअसल, श्राद्ध आने वाली संतति को अपने पूर्वजों से परिचित करवाने की प्रक्रिया है।इन पंद्रह दिनों के दौरान उन दिवंगत आत्माओं का स्मरण किया जाता है,जिनके कारण पारिवार एक सुत्र में बंधा होता है। इस दौरान उनकी कुर्बानियों व योगदान को याद किया जाता है। इस अवधि में अपने बच्चों को परिवार के दिवंगत पूर्वजों के आदर्श व कार्यकलापों के बारे में बताया जाता है , ताकि वे कुटुंब की स्वस्थ परंपराओं का निर्वहन कर सकें।

शास्त्र जीवित व्यक्ति को भी अपना भी, श्राद्ध करने की अनुमति देता हैं जिसे" जगतिया" कहते है। गीता प्रेस ने इस संदर्भ में एक पुस्तक 'जीव छ्राद्धपद्धति' प्रकाशित किया है ,जिसमें व्यक्ति अपना श्राद्ध स्वयं कैसे करे की  प्रक्रिया के बारे में बताया गया है।प्राचीन काल में ऋषिमुनी जिनके संतान नही होते थे ,इतिहास में भी कई राजाओं का जिक्र है जिसने स्वयं अपना श्राद्ध, किया था जीते जी ।इस प्रकिया को जगतिया कहते है।

जगतीया की प्रक्रिया  पांच दिन में पूरी होती है। किसी भी महीने में कृष्ण पक्ष की द्वादशी से लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तक यह प्रक्रिया पूरी की जाती है।

गीता प्रेस ने इस पुस्तक को तैयार करने में आदित्य पुराण, लिंग पुराण, श्राद्ध चिंतामणि, धर्मसिंधु, गरुण पुराण, षट्त्रिंशन्मत, वीर मित्रोदय संस्कार प्रकाश, श्राद्ध कल्प लता, ब्रह्मपुराण, श्राद्ध कासिका, श्राद्ध मयूख, श्राद्ध पद्धति, मत्स्य पुराण आदि ग्रंथों का सहारा लिया है।

वर्तमान में भी कुछ लोग ऐसा कर रहे है ,कारण स्पष्ट है बच्चों का अपने बुज़ुर्ग परिजनों के प्रति अनदेखी।आज के समय में बुजुर्गों का ओल्डऐज होम में जाना, कोई नई बात नही है ।आज की भौतिकवादी जिंदगी में लोग रिश्तों को अहमियत ही नही देते जिस कारण जगतीया" की इस प्रकिया को बढ़ावा मिल रहा है।

जबकि ऐसा नही होना चाहिए दिवंगत प्रियजनों की आत्माओं की तृप्ति और मुक्ति के लिए श्रद्धापूर्वक  श्राद्ध करना चाहिए है।श्राद्ध के लिए आश्विनमास का कृष्ण पक्ष हमारे हिन्दु कलैंडर में तय किया गया है। ज्योतिषीय दृष्टि से इस अवधि में सूर्य कन्या राशि पर गोचर करता है। इसलिए इसे ‘कनागत’ भी कहते हैं। जिनकी मृत्यु तिथि मालूम नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस को किया जाता है।इसे सर्वपितृ अमावस या सर्वपितृ श्राद्ध भी कहते हैं।इस श्रद्धा पर्व के बहाने पूर्वजों को याद किया जाता है।

 जिनके पास समय अथवा धन का अभाव है, वे भी इन दिनों आकाश की ओर मुख करके दोनों हाथों द्वारा आह्वान करके पितृगणों को नमस्कार कर सकते हैं। श्राद्ध ऐसा दिवस हैं, जिनका उद्देश्य पारिवारिक संगठन बनाए रखना है।विवाह के अवसरों पर भी पितृ पूजा की जाती है। 

 हमारे समाज में हर सामाजिक व वैज्ञानिक अनुष्ठान को धर्म से जोड़ गया है ताकि परंपराएं निभाई जाती रहें। श्राद्धकर्म उसी श्रृंखला का एक भाग है जिससे सामाजिक या पारिवारिक परम्परा बनी रहे। हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है, मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण न किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती है।ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार, देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना जरूरी है। 

हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल में पितृ पक्ष श्राद्ध मनाए जाते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वे अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें। ब्रह्म पुराण के अनुसार, जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि द्वारा ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दी जाए, वह श्राद्ध कहलाता है. श्राद्ध के माध्यम से पितरों की तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है. पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है।

जिस प्रकार हम ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए नानाविध पूजा और त्यौहार मनाते है उसी प्रकार हमें अपने परिवार के बुजुर्ग, एव दिवंगत लोगो के प्रति भी निष्ठावान व सेवाभाव रखना पड़ेगा।क्योंकि भगवान का आशिर्वाद हमें तभी प्राप्त होता है जब पितृ प्रसन्न होते है,हमारा कल्याण होगा।

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