आइकोनिक जेएलएफ का समापन विचारोत्तेजक संवादों के साथ हुआ

आइकोनिक जेएलएफ का समापन विचारोत्तेजक संवादों के साथ हुआ


जयपुर, 23 जनवरी। फेस्टिवल के पांचवे और अंतिम दिन की शुरुआत मिक्स्ड नोट के साथ हुई। जहाँ पांचवें दिन के जबरदस्त प्रोग्राम का उत्साह था, वहीं फेस्टिवल का अंतिम दिन होने की हल्की उदासी भी। सुबह संगीत दिया सौरवब्राता चक्रवर्ती ने और पखावज पर उनका साथ दिया ऐश्वर्य अयादी ने। पांचवें दिन के पहले सत्र, ‘द वर्ल्ड: ए फैमिली हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमैनिटी’ में ब्रिटिश इतिहासकार सिमोन सीबेग ने अपने अभी तक के प्रकाशित काम और आने वाली किताब के माध्यम से दुनिया के इतिहास का तथ्यात्मक और दिलचस्प ब्यौरा दिया| सीबेग दुनिया में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों/इतिहासकारों की सूची में आते हैं| इस सत्र में उनसे संवाद करने के लिए मौजूद थे लेखक व इतिहासकार त्रिपुरदमन सिंह| चर्चा शुरू करते हुए त्रिपुरदमन ने कहा, “हम सभी जानते हैं कि इतिहास एक ब्लैक होल, एक अथाह सागर की तरह है... फिर उसमें से आप अपने पसंद की किरदारों या घटनाओं का चुनाव कैसे करते हैं?”

सीबेग ने कहा, “मैं उन परिवारों का चयन करता हूँ, जो मुझे आकर्षित करते हैं... जिनकी कहानियां मुझे बेचैन कर देती हैं|” सीबेग ने सोवियत यूनियन के पतन, ओटोमन साम्राज्य, स्टालिन, इतिहास के खलनायकों के बारे में विस्तार से लिखा है| उनकी आने वाली किताब, ‘वर्ल्ड हिस्ट्री’ में दुनिया के अन्य देशों के साथ भारत, चीन, कम्बोडिया पर भी विस्तार से लिखा गया है| वो इन देशों की कहानी उनके किसी मशहूर, विवादास्पद या महत्वपूर्ण परिवार/व्यक्ति के माध्यम से कहते हैं| सत्र में साम्राज्य, तानाशाही और लोकतंत्र पर भी बात हुई।   


एक अन्य सत्र ‘ए मिलियन मिशन’ में एनजीओ और सोशल सेक्टर से जुड़ी एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट का लोकार्पण हुआ| “ए मिलियन मिशन: सीएसओ कोएलिशन@75” नामक यह रिपोर्ट एंटरटेनमेंट, परफोर्मिंग आर्ट और एनजीओ सेक्टर से जुड़े लोगों पर कोविड के प्रभाव को व्यक्त करती है| इसके लोकार्पण के अवसर पर टीमवर्क आर्ट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर, संजॉय के. रॉय ने कहा, “पिछले साल हमने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ही इस रिपोर्ट का प्रस्ताव रखा था... ये रिपोर्ट इस नजरिये से और बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि इस क्षेत्र में पिछली रिपोर्ट 2012 में जॉन होपकिंस ने तैयार की थी और उसके बाद इस पर फिर काम नहीं हुआ। ये रिपोर्ट जमीनी स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव और उससे निपटने के समाधान बताती है।”रिपोर्ट लॉन्च के अवसर पर मैथ्यू चेरियन ने कहा, “ये रिपोर्ट बहुत से लोगों की मेहनत का फल है... इसमें इस क्षेत्र के बहुत से विशेषज्ञों ने योगदान दिया है। एनजीओ का अस्तित्व स्वतंत्रता के समय से ही है, और कुछ तो उससे पहले से बरक़रार हैं| उनकी महत्ता सरकार की नीतियों, कार्यों को समाज की पंक्ति में खड़े आखरी व्यक्ति तक पहुँचाने में है।”


इस अवसर पर यूएन रेजिडेंट कमिश्नर, शोम्बी शार्प ने कहा, “ये बहुत इम्पोर्टेंट डॉक्यूमेंट है... मुझे भारत में दूर-दूर तक जाने का अवसर मिला और मैं सोशल सेक्टर और एनजीओ में काम करने वाले बहुत से लोगों से मिला| उनसे भी मिला जिन तक ये मदद पहुंचाई जाती है| मुझे कहना होगा कि कोविड के समय में इन लोगों ने बहुत ही शानदार काम किया| ये लोग हैं जो समाज में वास्तविक बदलाव लाते हैं... मैं कहूँगा कि ‘साथ है तो संभव है|’ इस क्षेत्र में काम करने के लिए ये बेस्ट समय है और हमारा मकसद 2030 तक भारत में जमीनी हालात को बदलना है।” सत्र ‘द इम्मोर्टल किंग राव’ में वाल स्ट्रीट जर्नल में पत्रकार रह चुकी, अमेरिकी लेखिका वौहिनी वारा से संवाद किया पत्रकार, लेखिका व अनुवादक अनुपमा राजू ने| सत्र वौहिनी के उपन्यास, द इम्मोर्टल किंग राव पर आधारित था| अपनी किताब के माध्यम से वौहिनी ने भारत में नारियल की खेती करने वाले दलित परिवार के हालात पर बात की| अमेरिका में पैदा हुई वौहिनी के पिता आन्ध्र में नारियल की खेती करने वाले दलित परिवार से हैं| किताब का नायक अपनी पृष्ठभूमि से बाहर निकल, साउथ एशिया के सबसे बड़े टेक किंग के रूप में उभरकर आता है। वौहिनी ने कहा, “किताब और पाठक का बहुत ही अन्तरंग सम्बन्ध होता है... और बिना किसी सचाई या भावनाओं के आप एक दिल छू लेने वाली कहानी नहीं पेश कर सकते।” 


एक अन्य महत्वपूर्ण सत्र ‘फिफ्टीन जजमेंट्स’ में उन मामलों/मुकद्दमों की बात हुई जिन्होंने भारत के सामाजिक-आर्थिक स्वरुप को बदल दिया| सत्र का शीर्षक सीनियर एडवोकेट सौरभ किरपाल की किताब पर आधारित था| सत्र में सौरभ से संवाद किया लेखक-इतिहासकार त्रिपुरदमन सिंह ने| जजमेंट के बारे में लिखने पर सौरभ ने कहा, “मैं अक्सर फाइनेंस और लॉ के बारे में लिखता हूँ, और ये दोनों ही विषय पढ़ने के लिए उतने दिलचस्प नहीं हैं| लेकिन ये दोनों ही आम इन्सान को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले मामले हैं|” सत्र में जमींदारी उन्मूलन, बंगलौर वाटर सप्लाई केस, गोलकनाथ केस जैसे जजमेंट पर चर्चा हुई| सौरभ ने बताया कि जमींदारी उन्मूलन उस समय लाया गया था, जब भारत में बहुत गरीबी थी और कुछ चंद लोगों के हाथों में बहुत सी जमीन थी| ये विधेयक सीधे-सीधे ‘राईट टू प्रॉपर्टी’ को चुनौती दे रहा था| सौरभ की किताब, फिफ्टीन जजमेंट्स: केसेस दैट शेप्ड इंडिया’स फाइनेंसियल लैंडस्केप में ऐसे 15 जजमेंट पर लिखा गया है, जिन्हें समझकर हम भारत के वर्तमान हालात को और करीब से समझ सकते हैं।

फेस्टिवल का समापन बहु-प्रतीक्षित डिबेट के साथ हुआ। हमेशा से ही जेएलएफ के श्रोता फेस्टिवल के अंतिम दिन होने वाली धुआंधार बहस का इंतज़ार करते हैं। इस साल का टॉपिक था, “राईट और लेफ्ट के बीच की दूरी को कभी नहीं पाटा जा सकता”... इस विषय के पक्ष और विपक्ष में बोलने के लिए राजनीति, अकादमिक से गणमान्य वक्ता आमंत्रित थे। दोनों ही पक्षों ने खुलकर अपनी बात रखी।

टॉपिक/मोशन के पक्ष में बोलने वाले पहले वक्ता थे प्रसार भारती के सीईओ, जवाहर सरकार| उन्होंने लेफ्ट और राईट टर्म की उत्पत्ति के इतिहास के बारे में बताते हुए कहा, “1789 में पहली बार पैरिस की पार्लियामेंट में सांसद साम्राज्य के पक्ष-विपक्ष में बात करने के लिए जमा हुए थे। जो साम्राज्य के विरोध में थे वो लोग लेफ्ट में जाकर खड़े हो गए और पक्ष वाले लोग राईट में... तभी से ये टर्म बन गई| जो शासन के पक्ष में होते उन्हें राईट माना जाता और विपक्ष वालों को लेफ्ट। जैसे नॉर्थ और साउथ को नहीं मिलाया जा सकता, वैसे ही लेफ्ट और राईट को भी नहीं।”

मोशन के विपक्ष में बोलने वाले पहले वक्ता थे, डिप्लोमेट और लेखक, पवन के. वर्मा| उन्होंने कहा, “लेफ्ट और राईट पश्चिमी विचारधारा है। भारत में हम सिविलाइज़ेशन को वरीयता देते हैं... नेशनहुड हमारे लिए सबसे ऊपर है... हम वासुधैव कुटुम्बकम की परम्परा से हैं। 1950 में कांग्रेस ने आरएसएस को बैन किया था, लेकिन 63 में नेहरु ने खुद आरएसएस को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित किया था।” यही साबित करता है कि दोनों के अंतर को पाटा जा सकता है।

मोशन के पक्ष में साहित्यिक इतिहासकार पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा, “लेफ्ट और राईट टर्म भले ही पश्चिम में पैदा हुई हो, लेकिन इसकी प्रवृति हमेशा से भारत में मौजूद है| नचिकेता ने अपने पिता को गलत काम के लिए ललकारा था| इन दोनों धाराओं को मिलाना ही क्यों है| सभ्यता इन दोनों के रहने में ही विकसित हो सकती है, इनसे आँखें मूँद लेने पर नहीं।”

मोशन के विपक्ष में जेएनयू के वरिष्ठ प्रोफेसर मकरंद परांजपे ने कहा, “’नेवर’, ‘ऑलवेज’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने वालों को अपनी समझ का विस्तार करना चाहिए| वाम और दक्षिण तो साधना, योग के टर्म हैं, और इन दोनों के सहयोग से ही मंजिल को पाया जा सकता है| बहस लेफ्ट और राईट के बीच में नहीं, बल्कि राईट और रोंग के बीच होनी चाहिए... और मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि राईट वाले लोग सही हैं और लेफ्ट वाले गलत| मंच पर बैठे कई लोग इस दूरी को पार करके दूसरी तरफ गए हैं, तो दूरी को तो पाटा ही जा सकता है।”

मोशन के पक्ष में स्कोलर वंदना शिवा ने कहा, “मकरंद और पवन ने पहले ही कह दिया कि ये दोनों एक नहीं हो सकते... टर्म बदलनी चाहिए... तो यही तो बहस का विषय है कि ये दोनों कभी एक नहीं हो सकते। राईट साइड के लोग संस्कृति से जुड़े मुद्दों के लिए आवाजें उठाते हैं, जबकि लेफ्ट वालों के लिए समानता सबसे बड़ी चीज है।”

मोशन के विपक्ष में राजनेता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, “मकरंद ने कहा कि मंच पर बैठे कई लोग इधर से उधर गए हैं, मैं उनमें से एक हूँ... इंदिरा गाँधी से जब पूछा गया कि उनका भारत लेफ्ट अलाइन होगा या राईट अलाइन? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि ‘मैं भारत को यथार्थवादी के रूप में देखती हूँ| हमें बीच का रास्ता अपनाना चाहिए, तो चॉइस नहीं है, ये विकास की ज़रुरत है|’ तो ये भी इस दूरी को पाटने का ही क्रम है।”

सभी वक्ताओं ने जब अपनी बात कह ली तो उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी की बात काटने का भी मौका मिला| श्रोताओं ने भी डिबेट में बढ़-चढ़कर भाग लिया और दोनों ही तरफ के वक्ताओं से ज्वलंत सवाल पूछे और अंत में मोशन के पक्ष में वोट दिया। फेस्टिवल के डायरेक्टर्स और प्रोडूसर ने सभी को आभार के साथ 16वें संस्करण का समापन किया।

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