काला सोना हुआ तैयार

                काला सोना हुआ तैयार 

पूजा-अर्चना के साथ शुरू होगा अफीम में लुवाई-चिराई का कार्य 


तस्करों की हलचल बढ़ी,लेकिन तस्करी रोकने के दावे कर रहा हमारा सरकारी तंत्र


बाड़मेर 28  फरवरी( राजू चारण)। क्षेत्र के अधिकांश गांवों में विभिन्न में रोगों और जंगली जानवरों द्वारा नुकसान किए जा रहे भारी नुकसान के बीच यौवन पर आई काले सोने अफीम की फसल में किसानों ने शुभ मुहूर्त में धार्मिक विधि विधान से मां काली की विशेष पूजा अर्चना के साथ अफीम की फसल के डोडे की लुवाई-चिराई का कार्य शुरू कर देते हैं । किसानों का मानना है कि फसल पकने पर पौधे पर लगने वाले डोडे में दूध की अच्छी आवक व सुख समृद्धि की मनोकामना से शुभ मुहूर्त में मां कालिका की पूजा अर्चना कर लूवाई-चिराई की परंपरा है। इसे स्थानीय भाषा में (नाणा) भी कहते हैं। सुबह किसान अपने घरों से पूजा-अर्चना का सामान लेकर खेतों में पहुंचे। वहां शुभ-,दिशाओं में फसल की क्यारे की पाल पर नवदुर्गा अर्थात नव देवियों प्रतिमाओं की स्थापना की तथा रोली बांधकर घी और तेल का दीपक जलाकर और अगरबत्ती लगाकर मां काली की पूजा अर्चना नारियल चढ़ाया जाता है। उसके बाद पांच अफीम के पौधों पर लच्छा अर्थात रौली बांधकर पर डोडो पर चीरा लगाकर मां काली से अच्छी पैदावार होने की मन्नत मांगी जाती है ओर  अंत में प्रसाद वितरित किया जाता है । किसानों ने बताया कि नाणा करने से पूर्व माता जी की पूजा अर्चना की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। अफीम के डोडे दिन के समय नक्का यानी विशेष प्रकार की ओजार से चिरई करते हैं। उसके बाद अगले दिन सुबह माताजी को अगरबत्ती लगाने के बाद छरपलो से अफीम का दूध एकत्रित किया जाता है। लुवाई चिराई खत्म होने के बाद सुखे डोडो से पोस्त दाना निकाला जाता है। 

हालांकि अभी अधिकांश खेतों में अफीम की लुवाई-चीराई का काम शुरू नहीं हुआ है।थोड़े दिनों बाद बड़े पैमाने पर यह कार्य शुरू हो जाएगा।इस कार्य में दक्ष मजदूरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि इसमें दक्ष मजदूर मुहमांगी मजदूरी लेते हैं। किसानों को भी मजबूरी में उनको 800 से 1000 तक में प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी चुकानी पड़ती है। यही नहीं किसान मजदूरों को सुबह चाय नाश्ता ओर भोजन के अलावा उन्हें साधनों से घर से लाने को छोड़ने भी जाना पड़ता है। कुछ किसानों ने तो मजदूरों को तय समय से पहले ही इस कार्य के लिए कह दिया हैl कई गांवों में किसानों ने अपने खेतों में यौवन पर आई अफीम की फसल में विधि विधान के साथ लुवाई-चिराई का कार्य शुरू करने की तैयारियों में लगे हुए हैंl

 ्जानकार किसानों ने बताया कि इस फसल में अभी तना सड़न काली मस्सी, सफेद मस्सी, खांखरिया रोग, तना सड़न आदि रोंगो का प्रकोप चल रहा था किसान महंगे दामों पर विभिन्न कीट नाशक दवाई का छिड़काव कर फसल को बचाने का जतन कर रहे हैं। पिछले दिनों दो-तीन दिन से लगातार गिरे पाले की वजह से अफीम की फसल में आए डोडे भी झुलस गए है। जिससे फसल में काफी नुकसान हुआ है l

कोई किसान फसल को नीलगायों से बचाने के लिए टेप रिकॉर्डर की तेज आवाज कर, तो कोई किसान पटाखे छोड़ कर नील गायों को पक्षियों से इस बहुमूल्य फसल को बचाने का जतन कर रहे हैं। वहीं कई किसान नीलगायों के उत्पात व नुकसान से फसल को बचाने के लिए खेत के चारो और साड़ियां लपेट रहे हैं, तो कोई किसान ऑडियो-वीडियो की रील तो कई किसानों ने अपने खेत के चारों ओर लोहे के तार से तार बंदी कर फसल को बचाने का जतन कर रहे हैं। अभी क्षेत्र में खेतों में अफीम की फसल महक रही है। इससे किसानों में खुशी छाई हुई है। रात के समय झुंड के रूप में नीलगाय खेतों में घुस जाती है और अफीम की फसल चट कर मदमस्त होकर फसल को रौंदकर चली जाती है। 

बता दे कि मध्यप्रदेश सहित नजदीकी राज्य के प्रतापगढ़ व चित्तौड़गढ़ जिले पूरे देश में काले सोने की तस्करी के लिए जाने जाते हैं। यहां मौसम की अनुकूलता एवं अच्छी पैदावार के चलते अफीम की फसल का अच्छा उत्पादन होता है। ऐसे में इसकी तस्करी का अवैध कारोबार भी शुरू हो जाएगा। इस वर्ष अफीम की फसल की अच्छी पैदावार होने की आस लगाए बैठे खासकर पश्चिमी भाग राजस्थान के मारवाड़ , पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात व महाराष्ट्र के तस्करों के साथ ही स्थानीय तस्करों से इसके अवैध तस्करी के लिए संपर्क साधने में लग गए हैं। लुवाई-चिरई का दौर शुरू होने के बाद तस्कर काला सोना यानी अफीम का अवैध रूप से परिवहन कर अपने क्षेत्रों में ले जाएंगे। वही लुवाई चिरई का कार्य शुरू होने से बाहरी तस्करों की इलाके में हलचल बढ़नी शुरू हो गई जाएगी।नजदीकी जिलो की पुलिस भी तस्करी रोकने के लिए मुस्तेद है। लेकिन फिर भी राज्य की पुलिस तंत्र पर लगातार सवाल खड़े हो जाते हैं।

क्षेत्र के किसानो को अफीम की फसल मुनाफे की फसल लगती है। इस फसल में  किसानों को काफी ज्यादा मुनाफा है। ऐसे में इसकी अवैध तस्करी का कारोबार भी बड़े पैमाने पर फलता फूलता है। क्योकि इसमें किसानो को काश्त से अफीम के अलावा डोडा-चूरा, पोस्ता भी प्राप्त होता है ओर अफीम की पत्तियां भी बाजार में बतौर सब्जी के लिए बिकती है।

अफीम काश्तकारों का कहना है कि इस फसल की सार संभाल एक बच्चे की तरह की जाती है।ओर इन दिनों फूलों में से डोडे निकलने लगेगे । जिसके चलते काश्तकारों द्वारा खेंतों में ही अस्थाई झोपडिय़ा बनाकर दिन रात फसल की सार संभाल का कार्य किया जा रहा है।

अफीम की फसल में पत्तियों की सब्जी को विशेषकर मक्का की रोटी के साथ लोग चाव से खाया जाता है। अफीम की फसल जब छोटी थी तो किसानों ने निराई गुड़ाई के समय ही इसकी पत्तियों को एकत्रित कर सुखा दिया था। गर्मीयों के दिनों में भी किसान और लोग इसकी सब्जियों का ज़ायका लेंगे। 

अफीम के डोडे में से निकलने वाले पोस्ता दाना का भाव इस साल भी आसमान को छू रहा है। इस का भाव देशी घी से भी महंगा है।रिेटेल मे देशी घी का भाव आठ सौ रुपये से एक हजार रुपये तक है। वही किराणा के व्यपारियों ने बताया कि आजकल अच्छे पोस्ता दाना का भाव भी दो हजार रू किलो तक पहुंच गया है।

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