राजस्थान के बजट से अभिभावकों और छात्रों की आशा

   राजस्थान के बजट से अभिभावकों और छात्रों की आशा 



बिना अभिभावकों की राय लिए ना बने कोई शिक्षा पर कानून और बजट, अभिभावक और छात्रों को अपना पक्ष रखने के लिए मिले सामान अधिकार - संयुक्त अभिभावक संघ



जयपुर। केंद्र की सरकार हो या राज्य की सरकार हो सभी सरकारें शिक्षा को लेकर सभी बड़े-बड़े दावे और वादे भी करते है और आरोप-प्रत्यारोप भी करते है किंतु हकीकत देखते है तो धरातल पर कुछ दिखाई नही देता है, केवल प्रशासन के भरे हुए कागज और अभिभावक व छात्रों की निराशा हर बार, हर जगह दिखाई देती है। अगर देश को विकसित और ताकतवर देश बनाना है तो उसमें शिक्षा के विकास को महत्व देना अति आवश्यक है, प्रत्येक बच्चे तक शिक्षा पहुंचना बहुत जरूरी है और प्रत्येक बच्चा शिक्षित हो उसके लिए अभिभावकों तक पहुंचना बहुत जरूरी है। जैसे पढ़ने के लिए स्कूल और किताबें जरूरी है ठीक वैसे ही पढ़ाने के लिए अभिभावक और बच्चें भी उतने ही जरूरी है। जिस दिन सरकारों ने अभिभावकों तक अपनी पहुंच बना ली उस दिन देश को शिक्षित देश बनने से कोई रोक नही सकता है, इसके लिए सरकारों को योजनाबद्ध तरीके अभिभावकों तक पहुंचना होगा और शिक्षा को लेकर प्रचार-प्रसार करने के साथ-साथ सभी अभिभावकों व छात्रों को जोड़ना होगा। जब तक प्रत्येक घर का बच्चा शिक्षित नही होगा वह देश की तरक्की में कभी भी अपना योगदान नही दे पाएगा, अगर उनका योगदान नही मिलेगा तो देश तरक्की भी नही कर पायेगा। आजादी के बाद देश के भामाशाहों ने शिक्षित भारत को बनाने की कल्पना के साथ " शिक्षा " को चैरिटी रूप दिया था, किंतु जैसे-जैसे देश आगे बढ़ता गया शिक्षा से चैरिटी खत्म होती गई और आज यह पूरी तरह से शिक्षा केवल व्यापार बनकर रह गई। निजी स्कूलों और शिक्षा माफियाओं ने देश की इस सबसे बड़ी जरूरत को अपना धंधा बना लिया है। अब शिक्षा लेने वाला विकसित नही होता किन्तु शिक्षा देने वाला लाखो-करोड़ो रु कमाकर विकसित होता जा रहा है। 

सरकारी घोषणाओं में भी केवल छात्रों के हितों के दावे और वादे कर सपने परोसे जा रहे है, लेकिन निजी स्कूलों और माफियाओं द्वारा दावों और वादों की हवाइयां उड़ाई जा रही है जिससे सरकार की नाकामी पूरी तरह से साबित होती देखी जा सकती है।

संयुक्त अभिभावक संघ केंद्र और राज्य सरकार से मांग करता है कि वह हर बार की तरह अभिभावकों को निराश ना कर अभिभावकों के हितों का भी ध्यान रखे शिक्षा का पहला पड़ाव अभिभावकों के समर्पण से ही शुरू होता है, अगर अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाने में नाकाम साबित होगा तो वह केवल अभिभावक की नाकामी नही बल्कि सरकार द्वारा बनाई जा रही शिक्षा व्यवस्था की नाकामी साबित होगी। क्योंकि जब से शिक्षा ने चैरिटी को छोड़कर व्यापार का स्वरूप धारण किया है वह माध्यम आयवर्गीय और गरीब परिवारों की पहुंच से लगातार दूर होती जा रही है। अगर जिसका बच्चों की पहुंच से दूर हो जाएगी तो शिक्षा व्यवस्था बनाना सरकारों के बेतुका साबित होगा। शिक्षा को प्रत्येक बच्चें तक पहुंचाने के लिए सरकारों को व्यापक स्तर पर शिक्षा में सुधार करने की आवश्यकता है। जिसके लिए सरकारों को अपने विचारों, सुझावों में अभिभावकों और छात्रों को बराबर का एक सामान अधिकार देना होगा, तभी शिक्षा के स्तर में सुधार देखने को मिलेगा। वर्षो से बन रहे बजट में जितना महत्व निजी स्कूलों और शिक्षा माफियाओं को दिया जाता है उतना ही महत्व अभिभावकों पर भी दिया जाना चाहिए। सरकारों की जिम्मेदारी केवल शिक्षा देने वालो तक सीमित नही रहनी चाहिए बल्कि शिक्षा प्राप्त करने और करवाने वाले अभिभावक व छात्रों के विचारों को शामिल करने तक होनी चाहिए।

प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि राजस्थान की बात करते है तो शिक्षा व्यवस्था में धरराल पर केवल राजनीतिक भाषण, दावे और वादे दिखाई देते है, आज भी प्रदेश के सरकारी स्कूलों की दुर्दशा देखकर साफ देखने को मिलता है कि शिक्षा गरीबों की पहुंच से कोशो दूर है और वर्तमान में चल रही व्यवस्था से वह कोशों दूर होती जा रही है। राजधानी जयपुर के जगतपुरा, सांगानेर, भांकरोटा, मुहाना, गोनेर, आगरा रोड़ के दर्जनों ऐसे स्कूल है जहां बच्चों की मूलभूत सुविधाएं जैसे अच्छे क्लास रूम, टॉयलेट, पीने का पानी, टेबल-कुर्सी, स्कूलों में साफ-सफाई तक कि व्यवस्था नही है। निजी स्कूलों की फीस को लेकर बने फीस एक्ट 2016 कानून की पालना नही हो रही है, प्रत्येक बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़ाई कर सके इसको लेकर बने आरटीई कानून की भी पालना सुनिश्चित नही हो रही है। ऐसी स्थिति में प्रदेश का अभिभावक कैसे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवा पायेगा, जिस पर राज्य सरकार को सख्ती के साथ कार्य करना चाहिए। सरकारी हो या निजी स्कूल हर स्तर पर अभिभावकों और छात्रों को खुलेआम लुटाने की योजना बनाई  जा रही है उन्हें जबर्दस्ती परेशान किया जा रहा है।

निजी स्कूलों की फीस को लेकर सुप्रीम कोर्ट से 3 मई 2021 और 1 अक्टूबर 2021 को दो बार आदेश आ चुका है किंतु आजतक किसी भी निजी स्कूल में उस आदेश तक की पालना सुनिश्चित नही करवाई जा रही है। शिक्षा विभाग की मीटिंगों में ना अभिभावकों को अहमियत नही  मिलती है और ना अभिभावक प्रतिनिधियों अपना पक्ष रखने के लिए आमंत्रित किया जाता है, जबकि स्कूल संचालकों के आधार पर कानून अभिभावकों पर थोप दिए जाते है। केंद्र सरकार के बजट 2024 से अभिभावकों को घोर निराशा हाथ लगी है, राजस्थान सरकार से उम्मीद है कि वह अभिभावकों और छात्रों पर ध्यान देगी, राजस्थान सरकार से मांग है कि वह शिक्षा माफियाओं और व्यापारियों की तरह अभिभावकों और छात्रों को अपना पक्ष रखने के लिए सामान अधिकार प्रदान करेगी, शिक्षा विभाग की प्रत्येक सुझाव बैठकों में अभिभावकों को अपना पक्ष रखने के लिए आमंत्रित करेगी और बिना अभिभावकों की सहमति के कोई भी कानून नही थोपेंगी।

*बिना अभिभावकों का पक्ष जाने, ना कानून बने और ना ही संसोधन हों, अभिभावकों को अपना पक्ष रखने के लिए सामान का अधिकार मिले - अरविंद अग्रवाल*

प्रदेश अध्यक्ष अरविंद अग्रवाल ने कहा कि अब तक शिक्षा को लेकर जितने भी बजट केंद्र सरकार द्वारा आये हो या राज्य सरकार से आये हो सभी बजट " थोथा चना बाजे घना " के आधार पर आए है। बजट में सरकारों ने दावे और वादे तो खूब किये है, अभिभावकों गुमराह भी बहुत किया है। किन्तु अब अभिभावक जागरूक होता जा रहा है और सरकारों से मांग करता है की वह शिक्षा को प्रत्येक बच्चे तक पहुंचाने और विकसित भारत मे योगदान देने के लिए अभिभावकों को भी बराबरी का अधिकार देंवे। बिना अभिभावकों की सहमति या पक्ष जाने ना कोई कानून बने और ना ही किसी कानून में बदलाव किया जाए। अगर शिक्षा से जुड़े किसी कानून में बिना अभिभावकों की सहमति के कोई बदलाव या कानून बनेगा तो उस कानून का अभिभावक कभी भी स्वीकार नही करेंगे।




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