नो नैक , नो एडमिशन, भ्रष्टाचार के सांये में नैक

       नो नैक , नो एडमिशन, भ्रष्टाचार के सांये में नैक

                           डॉ.तेजसिंह किराड़

                   (वरिष्ठ पत्रकार व शिक्षा समालोचक) 


आखिर कितनी अजीबों गरीब स्थिति बन चुकी हमारे शिक्षा संस्थानों के मूल्यांकन करने वाली राष्ट्रीय एजेंसियों की ?  देश  में एक ओर विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए द्वार खोले जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर देश में हजारों हज़ारों महाविद्यालयों ओर सैकड़ों विद्यापीठों की गुणवत्ता को सही मापदंडों को लेकर मूल्यांकित करने वाली नैक (नेशनल असेसमेंट एंड एक्रिडिटेशन कॉउंसिल) एजेंसी आज चारों ओर से गले- गले भ्रष्टाचार से आरोपित हो रही है। सूत्रों से मिली जानकारी ओर हाल ही में नैक के कार्यकारी अध्यक्ष डा. भूषण पटवर्धन के त्यागपत्र ने पूरे शिक्षा जगत में एक खलबली मचाकर रख दी हैं। आज डॉ पटवर्धन के कार्यकाल में हुए नॅक मूल्यांकन ओर त्यागपत्र ने सैकड़ों कालेजों के मूल्यांकन को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ हमारी यूजीसी (विश्व विद्यालय अनुदान आयोग) ने हर एक अनुदानित ओर गैर अनुदानित कालेजों को ओर विश्वविद्यालयों को भी नॅक मूल्यांकन होना अनिवार्य कर दिया गया है वहीं ये विश्व विद्यालय ओर कालेज भी अपने यहां पर उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं को लेकर कितने गंभीर ओर सकारात्मक पहल के लिए तैयार हैं यह तो जग जाहिर है कि यूजीसी के द्वारा बार बार नॅक करवाने निर्देशों के बावजूद समय पर ना तो नॅक मूल्यांकन करवा रहे हैं ओर ना ही विद्यार्थियों की शैक्षणिक जरुरतों को पूरा किया जा रहा है। ऐसे में नॅक मूल्यांकन समितियों कि कार्य प्रणाली पर ही सैकड़ों प्रश्न खड़े हो गए हैं। आगामी शिक्षा सत्र जल्द ही आरंभ होने जा रहा है।ओर विश्व विद्यालयों से संलग्नित बचे हुए महाविद्यालयों को संचालक उच्च शिक्षण संचालनालय द्वारा निर्देशित किया गया है कि नो नॅक, नो एडमिशन । ऐसे में कालेजों में प्रवेश को लेकर हजारों लाखों विद्यार्थियों में भी संशय जनक स्थिति बनी हुई है।अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर इन सब परिस्थितियों के लिए सही मायने में कौन जिम्मेदार है ? क्या हमारी जिम्मेदार विद्यापीठ है जो महज हर वर्ष यूजीसी के डर से केवल निर्देश को पालन करने की बात तो करती  है परन्तु नॅक मूल्यांकन के लिए सख्ती से पालन करवाने में सरासर फिसड्डी नजर आती है।यही कारण है कि अनुदानित ओर गैर अनुदानित कालेजों में आज भी बड़ी संख्या में नॅक मूल्यांकन समिति को नजर अंदाज किया जा रहा है! दूसरी ओर वे कालेजेस है जो विद्यार्थियों की सभी बुनियादी सुविधाओं को पूरा करने में असफल साबित हो रही है। ओर मोटी मोटी शुल्क राशि को लेकर कालेजों की मनमानी भी हर वर्ष यथावत बनी हुई है। सच तो यह है कि देश में उच्च शिक्षण नीति सिद्धांतों को लेकर केवल ढोल ही पिटा जा रहा है जमीनी स्तर पर सच्चाई तो कुछ ओर ही बंया कि जा रही है।

 *भ्रष्टाचार ओर नॅक की दोस्ती के मायने:* 

 राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मौलिक सिद्धांतों ओर बुनियादी सुविधाओं के मूल्यांकन को नजर अंदाज कर किस तरह से खुलेआम भ्रष्टाचार के रुप में धज्जियां उड़ाई जा रही है इसका प्रमाण मिलते ही पूरे देश में एकाएक खलबली सी मच गई है। इसका प्रमुख कारण है डा भूषण पटवर्धन का अचानक अपने नॅक अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देना। डा. पटवर्धन के कथन स्वयं बयां करते हैं कि देश में शिक्षा जगत में नॅक मूल्यांकन एक मोटा बिजनेस बन चुका है । मोटी राशि के दम पर रैवडियों कि तरह नॅक ग्रेड बांटी जा रही है।ओर इस बिज़नेस ने हजारों दलाल भी पैदा कर दिए हैं। शर्मशार डाक्टर पटवर्धन ने माना है कि शिक्षा में गुणवत्ता को दरकिनार कर खुलेआम भ्रष्टाचार के माध्यम से यूजीसी को भी कई मायनों में न्याय के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया गया है। 

 *दोषियों के नाम जाहिर करें पटवर्धन* : केवल डा. पटवर्धन के ही  त्यागपत्र देने से नॅक मूल्यांकन में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म नहीं माना जा सकता है।यह बिल्कुल सच है कि बड़ी भ्रष्ट मछलियों के सांये में हजारों छोटी मछलियों को भी सहारा मिला हुआ है।ओर इन्हीं छोटी मछलियों के कारण ही बड़ी मछलियां भी खुब पोषित हो रही है।

 *नॅक अनिवार्य फिर भी अनुदान क्यों ?* देश में आज हजारों महाविद्यालयों में नॅक मूल्यांकन नहीं हो पाया है। किन्तु उन्हें दर वर्ष अनुदान राशि प्रदान की जा रही है। ओर जो गैर अनुदानित कालेजेस वे भी धड़ल्ले से हर वर्ष एडमिशन ले रहे हैं। प्रश्न उठता है कि यूजीसी निर्देश जारी करने के बावजूद इतनी असहाय ओर लंगड़ी क्यों है जो अपने ही आदेशों का परिपालन ठीक से नहीं करवा पा रही है। 

 *भ्रष्टाचार ओर नॅक एक सिक्के के दो पहलू :* सूत्रों कि माने तो यह चर्चा जोरों पर है कि  डाक्टर पटवर्धन के एक वर्षीय कार्य काल में भ्रष्टाचार इतनी चरम सीमा पर पहुंच गया कि कालेजों में बुनियादी साधन ,सुविधा ओर सेवाओं के ना होने पर भी नॅक मूल्यांकन कर सहजता से उन्हें रेटिंग प्रदान कर दी गई है। यही नहीं आरटीओ विभाग जैसे नॅक मूल्यांकन विभाग में भी हजारों दलालों की दुकानें फलफूल रही है। सीधे सेटिंग के इस कारोबार में करोड़ों अरबों रूपए का भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक फैला हुआ है। आजकल तो सीधे दिल्ली से काल आता है कि आपके कालेज को नॅक मूल्यांकन करवाना है क्या ? 

 *आखिर कब बंद होगा ये गोरखधंधा :* मानव संसाधन विकास मंत्रालय को चाहिए कि विश्व विद्यालयों ओर शैक्षणिक संस्थानों में नॅक मूल्यांकन जैसे महत्वपूर्ण कार्य में हो रहे भ्रष्टाचार को सख्ती से रोका जाए वहीं दोषी पदाधिकारियों को कठोर से कठोर सजा के प्रावधान भी सुनिश्चित करें। साथ ही, संस्थानों में यदि बुनियादी सुविधाओं का अभाव है तो उन्हें नोटिस जारी कर बिल्कुल बंद कर दिया जाएं। 

 *महाराष्ट्र में अनुदानित नो नॅक  कालेज की संख्या :* सरकारें आती है ओर चली जाती है परन्तु हर विभागों में समस्याओं का अंबार वैसा ही बना रहता है । सूत्रों के अनुसार वर्तमान में महाराष्ट्र में 584 ऐसे अनुदानित कालेज है जिनमें नॅक मूल्यांकन नहीं हो पाया है ओर अनुदान धड़ल्ले से इन्हें जारी किया जा रहा हैं। नागपुर में-41 वर्धा-12 वासीम-9 यवतमाल-8 सोलापुर-18 ठाणे-23 सांगली-17 सिंधुदुर्ग-3 सातारा-19 पूणे-42 रायगढ-16 रतनागिरी-6 धाराशिव-13पालघर-01

नासिक-23लातूर-23 जलगांव-22 मुंबई-43 जालना-6 कोलहापुर-22 गडचिरोली-10

गोंदिया-3 हिंगोली-6 परभणी-10 नांदेड-21 नंदुरबार-11बुलढाणा-15चंद्रपुर-18धूले-14छत्रपति संभालीनगर-23 बीड-25 भंडारा-7अकोला-12

अमरावती-25 ओर अहमदनगर में 19 अनुदानित कालेजों को ना तो नॅक मूल्यांकन किया गया है और ना ही उनका अनुदान रोका गया है।

 *राजनीति के शिकार हो रहे विद्यापीठ ओर कालेज:* सच तो यह है कि हर राज्यों में सरकारों की कठपुतली बन चुके विद्यापीठ ओर कालेजेस अपनी मनमर्जी से चलाएं जा रहे हैं। ऐसे यूजीसी के निर्देशों को भी डस्टबीन में फेंक दिया जाता है। ऐसे में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होना लाजमी है। आज लाखों विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के साथ सरासर खिलवाड़ किया जा रहा है।इसकी रोकथाम के लिए पालकों को ही न्यायालयों में जनहित याचिका दायर करना होगी।तभी भ्रष्ट व्यक्तियों को कठोर सजा भी मिल सकेगी।

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