धन धन श्री गुरु नानक देव जी महाराज

            धन धन श्री गुरु नानक देव जी महाराज 



                 (भक्ति तथा मानवता के हित का सामंजस्य)


                             नानक नाम चढ़दी कला ।

                             तेरे भाने सरबत का भला ।।


श्री गुरु नानक देव जी के 554 वे प्रकाश पर्व (27 नवंबर) की सम्पूर्ण जगत को बधाई एवम् हार्दिक शुभकामनाएँ ।


                                 -एक परिचय-

सिखों के प्रथम गुरु एवं संस्थापक श्री गुरु नानक देव साहिब जी का समकालीन संतो की आध्यात्मिक सच्चाइयों के प्रति दृष्टिकोण एवं समानता के बावजूद गुरु साहिब की अंतदृष्टि ओर आत्मज्ञान का संकेत स्पष्ट दिखायी देता है उन्होंने अपने समय के जीविक और समाज में गिरे दबे कुचले लोगो पर हो रहे उत्पीडन को समझा और उनको बराबरी अर्थात समानता का अधिकार देते हुऐ उन्हे बल प्रदान किया जिससे वह  समाज मे सिर उठा के खडे हो पाये ।

नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ।।

ननकु तिन के संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ।।

जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तरी बखसीस ।।

गुरु साहिब ने स्त्री जाति के लिये समाजिक और धार्मिक अधिकारो के लिऐ आवाज बुलंद की और शब्द गुरुबाणी में फरमाया -

 '' सो कयो मंदा आखिए जित जमे राजान'' 

अर्थ कि वह स्त्री जो राजाओ और समस्त समाज की जननी है वह किस प्रकार से पुरुष से कम महत्वपूर्ण हो सकती है वह सदैव पूजनिये है ।

गुरु नानक साहिब ने 4 धर्म जाग्रती यात्राएं  की जिसे उदासीयों का नाम दिया गया ।वह प्रयाग हरिद्वार काशी गोरखनाथ सब जगह गए और समाज में फैले कर्मकांड पाखंड पर लोगो के बीच जाकर बात की ।सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने लोगों के बीच बैठ विचार गोष्टी की ओर लोगो की सोच बदल दी ।हरिद्वार के पंडितों हो या जगन्न नाथ पूरी के,मक्का हो या गोरख नाथ सब जगह उन्होंने तर्क से बात की।

लगभग पूरे भारत के साथ साउथ एशिया, ईरान, अफगानिस्तान, रशीया, बगदाद, चीन ओर तिब्बत तक लगभग 30,000 किलोमीटर की पैदल यात्रा की ।

गुरु नानक साहिब ने सफल एवं उत्कृष्ट जीवन के तीन सिद्धांत दिए

किरत करो 

नाम जपो 

वंड छको

इन तीन बातों मैं बहुत कुछ छिपा है 

किरत करो 

कामचोर या मेहनत ना करने वाले लोगो से गुरु नानक ने दूरी बनाकर रखी 

किरत मतलब जीविका को पहली तवज्जो दी है सशर्त यह कमाई साफ सुथरी होनी चाहिए ।कहने का तात्पर्य किसी का हक नहीं मारना चाहिए बेईमानी नही करनी चाहिए।

नाम जपो 

नाम जपो मतलब उस मालिक के जितने भी गुण है वह आप मे समाहित हो जाए तात्पर्य आप के शरीर का हर हिस्सा उस मालिक को याद कर के कार्य (कृत) करे और उस कृत में से मालिक यानी अकालपुरख या भगवान नजर आए अर्थात् आप का हर एक्शन भगवान की सोच को प्रकट करता हो ईश्वर का नाम मुख से प्रवेश कर एक्शन में नजर आए खाली मुख में ही न रह जाये ।

वंड छको

अब आपके पास अच्छी नीयत से की गई कमाई भी है ओर मालिक के दिये अच्छे गुण भी है ।अब इन दोनों को आप ने मानवता को बांटना है । इसी कारण आपको सिख एवं श्री गुरु नानक का अनुयायी लंगर (भोजन) एवं भजन बांटता  लोगो की सेवा करता नजर आएगा ।यह गुरु नानक साहिब की ही तो देन है।

                           (रविंद्र पाल सिंह नरूला)

             संयोजक, जयपुर सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी ।

                      मुख्य सरंक्षक, जयपुर सिख समाज

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