सिन्धी शिक्षक प्रशिक्षण सेमिनार संपन्न

              भारतीय सिन्धु सभा, राजस्थान

सिन्धी भाषा व संस्कारों को बढावा देने के लिए होगें साप्ताहिक शिविर-महेन्द्र कुमार तीर्थाणी 



               सिन्धी शिक्षक प्रशिक्षण सेमिनार संपन्न 


जयपुर  28  नवंबर ( पीयूष बच्चानी ) । राष्ट्रीय सिन्धी भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली एवं भारतीय सिन्धु सभा, राजस्थान के संयुक्त तत्वाधान में  आयोजित सेमिनार को मुख्य अतिथि  राष्ट्रीय उपाध्यक्ष महेन्द्र कुमार तीर्थाणी ने सम्बोघित करते हुए बताया कि दोनो संस्थाओ द्वारा प्रदेश के सभी जिलो में सिन्धी भाषा व संस्कृति के विकास के लिए किये गये प्रयास सफल रहे है एवं भाषा का प्रचार प्रसार अनवरत जारी है। महामंडलेश्वर हंसराम उदासीन द्वारा ऑनलाइन आशीर्वाद देते हुए साप्ताहिक शिविर के आयोजन की प्रेरणा दी।

 सभा के भाषा मंत्री नवल किशोर गुरनाणी ने बताया की  गत चार वर्षो से सिन्धी भाषा सर्टिफिकेट, डिप्लोमा एवं एडवान्स कोर्स के कार्य में  राजस्थान अग्रिम स्थान पर बना हुआ है, साथ ही प्रदेश के 21 जिलो में भाषा के विकास का कार्य हुआ है एवं भविष्य में 40 नवगठित जिलो में प्रचार प्रसार का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस समय प्रदेश स्तर पर 40 सुपर वाइजर  व 115 शिक्षा मित्रों के सानिध्य में 215 क्लासे चल रही है।

प्रदेश महामंत्री ईश्वर मोरवाणी  ने कहा कि गत दस वर्षो से गर्मी की छुट्टीयों में  सभा  द्वारा बाल संस्कार शिविरों का आयोजन सफलता पूर्वक किया जा रहा है, इन बाल संस्कार शिविरों का आयोजन अब वर्ष भर साप्ताहिक रुप से किये जाने का आव्हान किया।

भाषा व संस्कृति मंत्री डाॅ. प्रदीप गेहाणी ने राष्ट्रीय् सिन्धी  विकास परिषद से विभिन्न कार्यक्रमो के लिए स्वीकृति हेतु पत्राचार किये जाने व इस प्रकार के आयोजन वर्षभर किये जाने का सुझाव दिया साथ ही नई शिक्षा नीति के लाभ बताए।

प्रदेश उपाध्यक्ष(युवा) दिपेश सामनाणी  द्वारा समय के साथ चलने व समस्त दस्तावेजो को पीडीएफ व एक्सेल सीट पर कार्य को सुगम रुप से करने का सुझाव दिया साथ ही विभिन्न माध्यमों से सिंधी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने लाभ बताए। 

प्रदेश अध्यक्ष(मातृशक्ति)  शोभा बसन्ताणी ने अपने उद्धबोधन में बाल अवस्था में ही संस्कार देने का आव्हान किया साथ ही शिक्षा मित्रों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकारी योजनाओं की जानकारी, स्वयं सहायता समूह बनाने, सरकारी ऋृण योजनाओं की जानकारी व मातृशक्ति के सशक्त गठन की आवश्यकता पर बल दिया।

विषय वक्ता लता ठारवाणी (अजमेंर)  ने महापुरुषों का उल्लेख करते हुए शिक्षा का महत्व बताया व प्रदेश में स्वतत्रंता पश्चात  विभिन्न जिलो में सिंधी स्कूलो के हालात व वर्तमान में बन्द हो चुके स्कूलो पर चिंता जाहिर करते हुए पुनः सुधार का सुझाव दिया।  

दिलीप नाथाणी (जोधपुर) द्वारा सिन्धी भाषा को अल्प भाषा का दर्जा देने की मांग व सिंधी भाषा को संसार की सबसे प्राचीन भाषा बताते हुए देवनागरी लिपी का महत्व बताया साथ ही शिक्षण की विधि व सिंधी भाषा की वर्णमाला को देवनागरी के  क्रम मे करने,शब्दकोष में अरबी शब्द की जगह हिंदी शव्दों के उपयोग  का सुझाव दिया। 

डाॅ. मनोहर लाल कालरा  ने नई शिक्षा नीति के लाभ बताते हुए सिंधी विश्वविधालय के प्रयास करने के साथ ही व्यक्तित्व विकास, आई़टी., वाणिज्य में समाज की महारत का उल्लेख किया, साथ ही सरकार की विभिन्न योजनाओं से लाभ लेने की बात रखी।

 हीना सामनाणी ने समय के साथ नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत उच्च शिक्षा प्राप्त करने, घर में सिंधी भाषा का उपयोग के साथ भाषा का डिजीटलाइजेशन करने, प्रत्येक साहित्य का सिंधी में अनुवाद करने का सुझाव दिया। सत्र के समापन के अवसर  पर प्रदेशाध्यक्ष मोहनलाल वाणी ने भाषा, संस्कृति व इतिहास की जानकारी का महत्व बताते हुए शिक्षा मित्रो को दैनिक अखबार व समाचार चैनलों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने व विधार्थियों को अवगत करवाने का सुझाव दिया । साथ ही आगामी वषों में 1000 तक सिन्धी  क्लास लगाने का आव्हान किया। उन्होंने सिंधी विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों का भी सम्मान किया। बैठक का शुभारंभ आराध्यदेव भगवान झूलेलाल, भारत माता व सरस्वती माता के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्जवलन कर किया गया। स्वागत भाषण प्रदेश महामंत्री ईश्वर मोरवाणी व आभार मूलचन्द बसन्ताणी द्वारा प्रकट किया गया। समापन सामूहिक राष्ट्रगान से किया गया।

बैठक में अलवर से प्रतापसिंह कटारा, गिरधारी ज्ञानाणी, अजमेर से महेश टेकचॅदाणी, हनुमानगढ से घनश्याम मेघवाणी, पाली से कोकिलाबेन नारवाणी, राधाकिशन शिवलाणी, सोनम डालवाणी, बीकानेर से टीकम पारवानी,नीता सामनानी,  ब्यावर से कमल चंचलाणी , दिलीप ज्ञानचॅदाणी, वासुदेव टेकवाणी,  विष्णुदेव सामताणी, इन्दर रामाणी, कमल राजवाणी, हीरालाल तोलाणी, किरन होतवाणी, लक्ष्मीचन्द लालवाणी, बसंत खुशलानी सहित पदाधिकारी उपस्थित थें।

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