भागवत कथा प्रारंभ से पूर्व श्री गणेशजी को निमंत्रण
*भागवत कथा प्रारंभ से पूर्व श्री गणेशजी को निमंत्रण*
आचार्य प्रवर श्री सत्यप्रकाश महाराज के मुखारविंद से श्रीमद्भागवत कथा का अमृत पान करने का सौभाग्य प्राप्त होगा।
जयपुर। सत्यं शिवं सुन्दरं मानव कल्याण ट्रस्ट, मानसरोवर, जयपुर के तत्वावधान में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन आगामी 25 से 31 जनवरी तक नैमिषारण्य तीर्थ, उत्तरप्रदेश में होने जा रहा है। यहां आचार्य प्रवर श्री सत्यप्रकाश महाराज के मुखारविंद से श्रीमद्भागवत कथा का अमृत पान करने का सौभाग्य प्राप्त होगा।
उक्त आयोजन की सफलता की कामना के लिए मोतीडूंगरी गणेश मंदिर, जयपुर में संत, महंत और आचार्य जी के सानिध्य में माघ कृष्णपक्ष पंचमी बुधवार 07 जनवरी को पीले चांवल भेंट कर गणेश जी को निमंत्रण दिया गया। इस अवसर पर ट्रस्ट के भागवताचार्य सत्यप्रकाश महाराज, विष्णु प्रसाद गुप्ता, बृजेश अवस्थी, के.एम इंदौरिया, अनिल शर्मा, हरिकिशन कोटवाल, बबीता शुक्ला, प्रेमलता सोनी , इंद्रा गुप्ता आदि उपस्थित रहे।
इस अवसर पर महाराज जी ने नैमिषारण्य में कथा श्रवण, माघ मास और पितृमुक्ति के विशेष महत्व के बारे में विस्तार से बताया कि- शास्त्रों में माघ मास को *माधव मास* कहा गया है, माधव श्री कृष्ण का ही दूसरा नाम है अतः यह माह श्री कृष्ण को समर्पित है। यह दान, पुण्य और तप का महीना है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माघ मास में पवित्र नदियों के संगम और तीर्थों में वास करने से जन्म-जन्मानंतर के पाप नष्ट होते हैं।
ज्योतिर्विद डॉ.महेश शर्मा ने बताया इस वर्ष 24 जनवरी (षष्ठी) से 31 जनवरी (त्रयोदशी) तक का समय माघ शुक्ल पक्ष का है, जिसे चंद्रमा की बढ़ती कलाओं के कारण ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।
*जया एकादशी:*
श्रीमद्भागवत कथा के बीच में एकादशी आ जाए तो बहुत ही शुभ माना जाता है
इस आयोजन के दौरान जया एकादशी का आगमन 29 जनवरी को सबसे महत्वपूर्ण है। जया एकादशी के दिन भागवत कथा का श्रवण करने से व्यक्ति को पिशाच योनि या अधोगति से मुक्ति मिलती है।
फल: यह एकादशी श्री हरि विष्णु को अत्यंत प्रिय है। महाराज जी के मुख से इस दिन जया एकादशी व्रत कथा और कृष्ण लीलाओं का वर्णन सुनना सीधे वैकुण्ठ की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
जागरण: एकादशी की रात को श्रीहरि के नाम का जागरण और कीर्तन करना अति श्रेष्ठ माना गया है। इस संबंध में व्यास जी महाराज और ट्रस्ट के पदाधिकारी गण उचित निर्णय लेकर अवगत करवाएंगे।
*नैमिषारण्य में कथा श्रवण का महत्व:* शास्त्रों में कहा गया है कि-
*नैमिषे सूतमासीनं अभिवाद्य महामतिम्।*
*कथां भागवतीं पुण्यां चक्रुः पप्रच्छुरीप्सिताम्॥*" अर्थात् नैमिषारण्य में बैठकर कथा श्रवण करने से जीव आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है।
नैमिषारण्य वह स्थान है जहाँ स्वयं पुराणों का जन्म हुआ है, यहाँ सूत जी महाराज ने 88,000 ऋषियों को पहली बार श्रीमद्भागवत सुनाई थी। यहाँ कथा सुनना मानो 'गंगा के किनारे बैठकर अमृत पान' करने जैसा है। इस भूमि का कण-कण भक्ति और ज्ञान से स्पंदित है जो कथा के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।
*पितरों के निमित्त श्रीमद्भागवत का मूल पाठ (सप्ताह पारायण) करवाना सनातन धर्म में सर्वोच्च पितृ-सेवा मानी गई है।* श्रीमद्भागवत महात्म्य श्लोक संख्या 1.20 में कहा गया है कि-
*"न गया न च काशी च न पुष्करं न च प्रयागकम्।*
*श्रीमद्भागवतं यद्वत् मुक्तिदानं तथा भुवि॥"*
अर्थात पृथ्वी पर काशी, गया, पुष्कर या प्रयाग जैसे महान तीर्थ भी उस प्रकार मुक्ति देने में समर्थ नहीं हैं, जिस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण सहज ही मुक्ति प्रदान कर देता है।
स्कंद पुराण में भी उल्लेख है कि गया श्राद्ध से भी जो गति नहीं मिलती, वह भागवत श्रवण से सुलभ हो जाती है।
श्रीमद्भागवत महात्म्य में गोकर्ण और धुंधुकारी की कथा का प्रसंग इसका सबसे बड़ा प्रमाण है:
*प्रसंग:* गोकर्ण जी ने अपने प्रेत बने भाई धुंधुकारी की मुक्ति के लिए गया जी जाकर विधि-विधान से श्राद्ध किया और पिंड दान किया। किंतु वापस आने पर उन्हें पता चला कि धुंधुकारी की मुक्ति नहीं हुई और वह अभी भी प्रेत योनि में ही कष्ट पा रहा है। जब गोकर्ण जी ने सूर्य देव से इसका उपाय पूछा, तो सूर्य देव ने आज्ञा दी— *"श्रीमद्भागवतान्मुक्तिः सप्ताहं वाचनं कुरु"* अर्थात श्रीमद्भागवत का सप्ताह पारायण करो। तब गोकर्ण जी ने अपने प्रेत बने भाई धुंधुकारी की मुक्ति के लिए भागवत का पाठ किया। धुंधुकारी ने एक सात गांठ वाले बांस में बैठकर कथा सुनी और सातवें दिन वह दिव्य देह धारण कर भगवान के धाम गया।
श्रीमद्भागवत महात्म्य श्लोक 4.67 में भी उद्धृत है कि *"न मुक्त्वा तु गयाश्राद्धात् स मुक्तोऽत्र कथाश्रवात्॥"* अर्थात जो मुक्ति गया श्राद्ध करने से भी प्राप्त नहीं होती है वह मुक्ति विधिपूर्वक श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करने से प्राप्त हो जाती है यथा- "सप्ताहयज्ञेन हि मुक्तिरुक्ता, न संशयः कृष्णमुखोद्भवा सा।"अर्थात कृष्ण के मुख से निकली यह कथा सात दिन के यज्ञ (सप्ताह) से निश्चित ही मुक्ति देने वाली है।
श्रीमद्भागवत कथा पितृश्वरों के लिए प्रभावशाली है क्योंकि:- अक्षरमय ब्रह्म: भागवत को भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् 'वाङ्मय स्वरूप' (शब्द अवतार) माना गया है।
भाव प्रधान: गया श्राद्ध एक कर्मकांड है, जबकि भागवत श्रवण 'ज्ञान' और 'भक्ति' का मिश्रण है। जब पितर कथा सुनते हैं, तो उनका विवेक जागृत होता है और वे मोह-बंधन तोड़कर सीधे भगवान के धाम की ओर गमन करते हैं।
*निष्कर्ष:* शास्त्रों के अनुसार श्रीमद्भागवत कथा के दौरान अथवा अलग से जब कोई व्यक्ति किसी कुलीन, विद्वान और सदाचारी ब्राह्मण द्वारा भागवत का मूल पाठ सात दिवस तक पितरों के नाम से संकल्प लेकर सुनवाता है तो उसका पुण्य सीधे पितरों को प्राप्त होता है ।
भागवत के श्रवण से पितरों की यदि किसी निम्न योनि (प्रेत आदि) में गति हुई हो, तो उन्हें तत्काल मुक्ति मिलकर वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। 'श्रीमद्भागवत महात्म्य' में स्पष्ट है कि जो पितर प्यासे और भूखे हैं, उनके लिए भागवत कथा *"अमृत"* के समान है।
वंश वृद्धि और शांति: पितरों की तृप्ति से घर में सुख, शांति और वंश की वृद्धि होती है।
*कहाँ करवाएं भागवत जी के मूल पाठ:*
यद्यपि घर पर पाठ करवाना उत्तम है, लेकिन नैमिषारण्य में इसे करवाना 'अनंत गुना' फलदायी माना गया है। वहां पर भागवत के मूल पाठ करवाएंगे, तो वह स्थान स्वयं में इतना सिद्ध है कि वहाँ पितरों को कथा सुनाना उन्हें गया श्राद्ध से भी अधिक तृप्ति प्रदान करेगा। वहाँ किसी विद्वान ब्राह्मण द्वारा अलग से 'मूल पाठ' (संस्कृत पारायण) करवाना सर्वश्रेठ रहेगा। भागवत कथा से आपको और पितरों को *'भाव'* मिलेगा और ब्राह्मण के मूल पाठ से *'विधि'* पूर्ण होगी।
*तिल का महत्व:* पितृ कार्य होने के कारण पाठ के दौरान और तर्पण में काले तिल का प्रयोग अधिक करें।
*तुलसी अर्पण:* प्रतिदिन पाठ की समाप्ति पर भगवान के स्वरूप (ग्रंथ) पर तुलसी पत्र चढ़ाएं और पितरों की शांति की प्रार्थना करें।
*भोजन:* जिस दिन पाठ की पूर्णता (विश्राम) हो, उस दिन नैमिषारण्य में ब्राह्मणों या दीन-दुखियों को भोजन अवश्य कराएं।
*निष्कर्ष:* श्रीमद्भागवत की महिमा में यह स्पष्ट कहा गया है कि जो कार्य कठिन तपस्या, योग या तीर्थ यात्राओं से सिद्ध नहीं होते वे भागवत कथा श्रवण मात्र से फलित हो जाते हैं।
*सलाह:* जो भक्त नैमिषारण्य धाम में पितृश्वरों के निमित्त योग्य ब्राह्मण द्वारा श्रीमद्भागवत के सात दिन मूल पाठ करवाने के इच्छुक वे शीघ्र संपर्क करें, ताकि सारी व्यवस्थाएं यथा समय संपन्न हो सकें। अंत मैं इस दिव्य आयोजन के सभी साथियों विशेषकर "सत्यं शिवं सुन्दरं मानव कल्याण ट्रस्ट"* (श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ), ट्रस्ट के पदाधिकारियों को धन्यवाद ज्ञापित करता हूं जिनके चार माह के अथक प्रयासों के फलस्वरूप यह आयोजन मूर्तरूप लेने जा रहा है। इनके सहयोग से हम सभी इस दिव्य आध्यात्मिक लाभ से लाभान्वित होंगे और निःसंदेह आत्मिक और मानसिक शांति मिलेगी।
इस आध्यात्मिक समारोह में सभी सज्जन राग, द्वेष और परनिंदा से दूर रहकर प्रेम पूर्वक कथा श्रवण, भजन पूजन और कीर्तन का आनंद लें। एक बार पुनः ट्रस्ट पदाधिकारियों को इस आयोजन के लिए साधुवाद।
इस अवसर पर ट्रस्ट के पदाधिकारियों एवं सभी गणमान्य व्यक्तियों ने महाराज जी का अभिवादन कर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि सौभाग्य से इस तीर्थ स्थल में उक्त तिथियों में *तत्त्ववेत्ता, मर्मज्ञ भागवताचार्य श्री सत्यप्रकाश जी महाराज* के मुखारविंद से श्रीमद्भागवत कथा का अमृत पान करने का हमें अवसर प्राप्त होने जा रहा है।
महाराज जी केवल कथावाचक नहीं, बल्कि भागवत के रहस्यों (मर्म) को सरल भाषा में हृदय तक पहुँचाने वाले आचार्य हैं।
सनातन धर्म के प्रचार और प्रसार की लगन उनमें बचपन से ही विकसित हो गई थी, आपने स्कूली शिक्षा के पश्चात *शाहपुरा बाग संस्कृत कॉलेज से शास्त्री की उपाधि ली है* और
*जगतगुरु श्री रामानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शुक्ल यजुर्वेद में आचार्य/एम ए की उच्च शिक्षा प्राप्त की है।* आप राजस्थान सरकार से भी पुरस्कृत हैं आप को अपने परम पूज्य गुरुदेव ,संत और महापुरुषों का बहुत सानिध्य प्राप्त हुआ है।
इनकी कथा में शास्त्रीय प्रमाण और व्यवहारिक जीवन का सुंदर समन्वय होता है।
प्रभाव: महाराज जी का सानिध्य श्रोता के भीतर *'भक्ति', 'ज्ञान'* और *'वैराग्य'* को जागृत करता है। उनकी शैली में बृज भाषा की झलक मिलती है।
आचार्यजी ईस्वी सन् 2005 से श्रीमद्भागवत कथा, श्री राम कथा, श्री शिव पुराण कथा एवं अपने आध्यात्मिक प्रवचनों से लोगों को रसस्वादन करवा रहे हैं। पदाधिकारियों ने सभी सहयात्रियों से अपेक्षा की है कि वे आपस में एक दूसरे का विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों का सहयोग करेंगे और धैर्य पूर्वक इस यात्रा को सुखमय बनाने में ट्रस्ट को सहयोग प्रदान करेंगे। सभी सज्जन ट्रस्ट के पदाधिकारियों द्वारा दी गई हिदायतों और व्यवस्थाओं का पालन करें।

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