भागवत जी के मूलपाठ सुनवाने से मिलती है पितरों को शांति
भागवत जी के मूलपाठ सुनवाने से मिलती है पितरों को शांति
(भागवताचार्य सत्य प्रकाश महाराज)
पितरों के निमित्त श्रीमद्भागवत का मूल पाठ (संस्कृत में सप्ताह पारायण) करवाना सनातन धर्म में सर्वोच्च पितृ-सेवा मानी गई है। श्रीमद्भागवत महात्म्य, श्लोक संख्या 1.20 में कहा गया है कि-
*"न गया न च काशी च न पुष्करं न च प्रयागकम्।*
*श्रीमद्भागवतं यद्वत् मुक्तिदानं तथा भुवि॥"*
अर्थात पृथ्वी पर काशी, गया, पुष्कर या प्रयाग जैसे महान तीर्थ भी उस प्रकार मुक्ति देने में समर्थ नहीं हैं, जिस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण सहज ही मुक्ति प्रदान कर देता है।
स्कंद पुराण में भी उल्लेख है कि गया श्राद्ध से भी जो गति नहीं मिलती, वह भागवत श्रवण से सुलभ हो जाती है।
श्रीमद्भागवत महात्म्य में गोकर्ण और धुंधुकारी की कथा का प्रसंग इसका सबसे बड़ा प्रमाण है:
*प्रसंग:* गोकर्ण जी ने अपने प्रेत बने भाई धुंधुकारी की मुक्ति के लिए गया जी जाकर विधि-विधान से श्राद्ध किया और पिंड दान किया। किंतु वापस आने पर उन्हें पता चला कि धुंधुकारी की मुक्ति नहीं हुई और वह अभी भी प्रेत योनि में ही कष्ट पा रहा है। जब गोकर्ण जी ने सूर्य देव से इसका उपाय पूछा, तो सूर्य देव ने आज्ञा दी— *"श्रीमद्भागवतान्मुक्तिः सप्ताहं वाचनं कुरु"* अर्थात श्रीमद्भागवत का सप्ताह पारायण करो। तब गोकर्ण जी ने अपने प्रेत बने भाई धुंधुकारी की मुक्ति के लिए भागवत का पाठ करवाया। धुंधुकारी ने एक सात गांठ वाले बांस में बैठकर कथा सुनी और सातवें दिन वह दिव्य देह धारण कर भगवान के धाम गया।
श्रीमद्भागवत महात्म्य श्लोक 4.67 में भी उद्धृत है कि *"न मुक्त्वा तु गयाश्राद्धात् स मुक्तोऽत्र कथाश्रवात्॥"* अर्थात जो मुक्ति गया श्राद्ध करने से भी प्राप्त नहीं होती है वह मुक्ति विधिपूर्वक श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करने से प्राप्त हो जाती है।
*"सप्ताहयज्ञेन हि मुक्तिरुक्ता, न संशयः कृष्णमुखोद्भवा सा।"*
अर्थात कृष्ण के मुख से निकली यह कथा सात दिन के यज्ञ (सप्ताह) से निश्चित ही मुक्ति देने वाली है।
*श्रीमद्भागवत कथा पितृश्वरों के लिए प्रभावशाली है क्योंकि:-*
*अक्षरमय ब्रह्म:* भागवत को भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् 'वाङ्मय स्वरूप' (शब्द अवतार) माना गया है।
*भाव प्रधान:* गया श्राद्ध एक कर्मकांड है, जबकि भागवत श्रवण 'ज्ञान' और 'भक्ति' का मिश्रण है। जब पितर कथा सुनते हैं, तो उनका विवेक जागृत होता है और वे मोह-बंधन तोड़कर सीधे भगवान के धाम की ओर गमन करते हैं।
शास्त्रों के अनुसार श्रीमद्भागवत कथा के दौरान अथवा अलग से जब कोई व्यक्ति किसी कुलीन, विद्वान और सदाचारी ब्राह्मण द्वारा भागवत का मूल पाठ सात दिवस तक पितरों के नाम से संकल्प लेकर सुनवाता है तो उसका पुण्य सीधे पितरों को प्राप्त होता है ।
भागवत के श्रवण से पितरों की यदि किसी निम्न योनि (प्रेत आदि) में गति हुई हो, तो उन्हें तत्काल मुक्ति मिलकर वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। 'श्रीमद्भागवत महात्म्य' में स्पष्ट है कि जो पितर प्यासे और भूखे हैं, उनके लिए भागवत कथा "अमृत" के समान है।
*वंश वृद्धि और शांति:* पितरों की तृप्ति से घर में सुख, शांति और वंश की वृद्धि होती है।
*कहाँ करवाएं भागवत जी के मूल पाठ:*
यद्यपि घर पर पाठ करवा सकते है, लेकिन 88000 ऋषियों की पवित्र तपस्थली नैमिषारण्य में जहां सुबह सूत जी महाराज ने ऋषियों को एवं श्री वेदव्यास जी महाराज ने शुकदेव जी को भागवत जी श्रवण कराई अथवा उज्जैन, द्वारिका माथुर आदि तीर्थ मे इसे करवाना 'अनंत गुना' फलदायी माना गया है। वह स्थान स्वयं में इतना सिद्ध है कि वहाँ पितरों को कथा सुनाना उन्हें गया श्राद्ध से भी अधिक तृप्ति प्रदान करेगा। वहाँ किसी विद्वान ब्राह्मण द्वारा अलग से 'मूल पाठ' (संस्कृत पारायण) करवाना सर्वश्रेठ रहेगा। महाराज जी की कथा से आपको और पितरों को 'भाव' मिलेगा और ब्राह्मण के मूल पाठ से 'विधि' पूर्ण होगी।
*तिल का महत्व:* पितृ कार्य होने के कारण पाठ के दौरान और तर्पण में काले तिल का प्रयोग अधिक करें।
*तुलसी अर्पण:* प्रतिदिन पाठ की समाप्ति पर भगवान के स्वरूप (ग्रंथ) पर तुलसी पत्र चढ़ाएं और पितरों की शांति की प्रार्थना करें।
*भोजन:* जिस दिन पाठ की पूर्णता (विश्राम) हो, उस दिन नैमिषारण्य में ब्राह्मणों या दीन-दुखियों को भोजन अवश्य कराएं।
*निष्कर्ष:* श्रीमद्भागवत की महिमा में यह स्पष्ट कहा गया है कि जो कार्य कठिन तपस्या, योग या तीर्थ यात्राओं से सिद्ध नहीं होते वे भागवत कथा श्रवण मात्र से फलित हो जाते हैं।
*सलाह:* जो भक्त नैमिषारण्य धाम में पितृश्वरों के निमित्त योग्य ब्राह्मण द्वारा श्रीमद्भागवत के सात दिन मूल पाठ करवाने के इच्छुक वे शीघ्र संपर्क कर सकते है, ताकि सारी व्यवस्थाएं शीघ्र संपन्न हो सके।
* भागवताचार्य सत्य प्रकाश महाराज*
*📞 अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें:*
*94147 79308*


Comments