निवारू रोड स्थित एक निजी विद्यालय में शिक्षिका द्वारा मासूम छात्र की हत्या की साजिश!

 निवारू रोड स्थित एक निजी विद्यालय में

 शिक्षिका द्वारा मासूम  छात्र की हत्या की साजिश!



 “सत्ता और धनबल के आगे प्रशासन बेबस, एक ‘सॉरी’ से मासूम के घाव भर पायेगें!  —तो न्याय, जांच और कानून किस लिए?”


जयपुर। निवारू रोड स्थित एक निजी स्कूल की शिक्षिका द्वारा मासूम छात्र को बिल्डिंग की दूसरी मंजिल से धक्का देने का मामला सामने आया है। हालांकि  पुलिस द्वारा धक्का देने की पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन मासूम की मां द्वारा धक्का देने की बात कही जा रही है। मासूम छात्र की मां बहुत ही गरीब परिवार से आती है। जैसे तैसे अपने बच्चे को पढा लिखा कर बड़ा आदमी बनाने का सपना स्कूल प्रबंधन की लापरवाही की भेंट चढ गया।

सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार स्कूल की एक शिक्षिका एवम एक शिक्षक को मासूम एव उसके साथ पढने वाले छात्र ने  गलत अवस्था में क्लास रूम में देख लिया था । जिसकी वजह से शिक्षिका डर गई और पोल खुल जाने के मारे मासूम छात्र को ठिकाने लगाने की जुगत में लग गई। और 16 मार्च को जब मासूम छात्र स्कूल की दूसरी मंजिल पर गैलेरी में अपने जूते की लैस बाधनें को नीचे झुका तो दुश्चरित्र शिक्षिका ने उसे धक्का दे दिया जिससे बच्चा हाथ के बल नीचे गिरा,जिससे हाथ में फ्रेक्चर हो गया तथा चेहरे पर भी गभीर घाव बताए जा रहे है।वो तो गनीमत रही कि सिर के बल नही गिरा अन्यथा बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता। 

बच्चे के परिजनो ने झोटवाड़ा पुलिस थाना में शिकायत दर्ज करवाई है। वहीं बच्चे का अम्बाबाडीं स्थित निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। हालांकि मालिक बच्चे के आपरेशन होने तक अस्पताल में ही मौजूद रहें और मासूम के परिजनो के सामनें कानूनी कार्रवाई नही करने को लेकर गिड़गिड़ाते रहे। किन्तु यहां देखने वाली बात है कि विधालय  में जब शिक्षक ही गलत आचरण करेगें तो बच्चो को क्या शिक्षा देगें। ऐसी शिक्षिका को प्रशासन द्वारा कानूनी कार्रवाई कर उचित दण्ड दिया जाए तथा स्कूल प्रबंधन के खिलाफ भी कडी कार्रवाई करनी चाहिए। ताकि भविष्य मे इस तरह के अपराध की पुनरावृत्ति न हो सके। इस हादसे पर बच्चे के परिजनो ने गहरा रोष और आक्रोश व्यक्त किया है। 

ज्ञातव्य है कि पूर्व में मानसरोवर में भी एक निजी विद्यालय में प्रबंधन की लापरवाही से एक मासूम की मौत हो गई थी। ऐसे गंभीर और संवेदनशील मामले में सिर्फ़ “सॉरी” कह देने से स्कूल प्रबंधन को माफ़ कर देना यह दर्शाता है कि आज व्यवस्था न्याय नहीं, रसूख और धनबल से संचालित हो रही है।


1. अगर एक माफ़ी (Sorry) से किसी मासूम की गभीर चोटे माफ़ की जा सकती है, तो फिर कोर्ट, जांच एजेंसियां और कानून किस लिए हैं?

2. जब हर अपराधी माफ़ी मांगता है, तो क्या सभी गुनहगारों को सज़ा से छूट दे दी जानी चाहिए?

3. क्या बच्चों की जान की कीमत अब सिर्फ़ एक औपचारिक बयान तक सीमित रह गई है?


 सबसे अधिक चिंताजनक सवाल यह है कि—

अगर सत्ता पक्ष के विधायक और जनप्रतिनिधि विधानसभा जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक पटल पर स्कूल माफियाओं को संरक्षण देंगे, तो फिर स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा का मुद्दा कौन उठाएगा?


क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी माफियाओं को बचाना है या मासूम बच्चों के जीवन की रक्षा करना?

 यह मामला सिर्फ़ एक स्कूल या एक आदेश का नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था पर एक खतरनाक नज़ीर है। ऐसे निर्णयों से यह संदेश जाता है कि बड़े स्कूल, बड़ा पैसा और राजनीतिक संरक्षण हो तो कानून भी झुक सकता है।


1. स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर ज़ीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जाए।

2. रसूख और राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

3. भविष्य में किसी भी मासूम की जान की कीमत “माफी” बनकर न रह जाए, इसके लिए कानूनी और प्रशासनिक जवाबदेही तय की जाए।

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